हरेक चीज़ को झेल लेना अच्छी बात है , लेकिन ठाट-बाट से नीचे की चीज़ को नज़र अंदाज़ करना तो कहीं का नहीं बनता । दिमाग़ लगे बगैर , न देखना प्यार से, फिर किस्मत पर रोना तो कोई बात नहीं । जितना दो उतना उसी समय मिले तो ठीक. वरना , बेकार समझना ठीक नहीं । नियंत्रित करना ठीक , पर हरेक को नियंत्रित कर यह समझना की सब ठीक है यह बेवकूफी है । मशवरा बाबा घंटा जी का– बेकार मैं लोड ले , अपना और दूसरे का टाइम बर्बाद न करें , अपने कंट्रोलिंग स्विच को थोड़ा ऑफ रखे

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