जो समझ मैं न आये उसे कलाकार या लेखक या फिलॉसफर समझ खुद को दे मत देना , कहने से तुम कब मानोगे , जल्दी फिसलना आदत है , और आदत मैं ही मजा है । तथ्यों की ओर से लापरवाह हो …..खूब प्रेम करें , ले या दे , आखिर सिर तो आपका अपना है जनाब । दूर हो तो गिला सिकवा, पास तो चलो थोड़ा दिमाग खा लो , फिर मान जाओ , और करा लो शोषण । अब तो sms पर बिजी टोन भी नहीं है की पता चले की कितनो से बात चल रही है, चोरी चोरी चुपके चुपके । सम लिंग विवाह को बहुत जगह मंजूरी तो मिली है , पर आज भी यह है कष्टकारी ही है ।

मशवरा बाबा घंटा जी का – बहुत जगह दिमाग घुसा के अपने दिमाग का दही नहीं करें ,

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