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नेहरू काल – क्यों की गयी सेना कमजोर ?

1950 शुरू होते ही चीन का नेतृत्व के समझ में आ गया था की भारत की कोई उग्र प्रतिक्रिया नहीं है सीमा को लेकर या फिर सीमा पार हो रही तिब्बती संघर्ष को लेकर( 7 अक्टूबर 1950 को चीन की सेना ने तिब्बत पर चढाई कर दी थी ) , इस बात ने चीन को आश्वास्त किया , और उसने चुपके चुपके सड़क बनानी शुरू कर दी अक्साई चिन में , क्योंकि यहाँ पर न कोई आबादी थी न कोई भारतीय चौकी , और न कोई जागरूकता थी भारतीय नेतृत्व में इस क्षेत्र को लेकर , 1958 में जा कर भारतीय नेतृत्व को पता लगा की अक्साई चिन में 178 किलोमीटर लम्बी सड़क बन गयी है, और चीन उस पर काबिज हो गया है।

भारतीय सेना जिसकी संख्या 4 लाख थी आज़ादी के समय पर , और जिसकी वीरता के प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध साक्षी थे , उसे कम करके आधा कर दिया गया था , प्रधान मंत्री नेहरू का मानना था कि नए आज़ाद भारत को सेना की भूमिका पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। एक बार का किस्सा है की , आज़ादी के बाद उस समय के तत्कालीन कमांडर इन चीफ जनरल सर रॉब लॉकहार्ट जब नेहरू जी के पास पहुंचे कुछ कागजों को लेकर पहुंचे , यह कागज भारतीय डिफेन्स पालिसी के बारें में थे , तब नेहरू जी बोले ” क्या फालतू की बात है ?, हम अहिंसावादी है , हमे सेना नहीं चाहिए , खत्म कर दीजिये इसे , हम सिर्फ पुलिस से काम चला लेंगे “।

By No 9 Army Film & Photographic Unit – http://media.iwm.org.uk/iwm/mediaLib//51/media-51222/large.jpgThis is photograph IND 4851 from the collections of the Imperial War Museums., Public Domain, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=27676791
द्वितीय युद्ध के दौरान जापानी अफसरों का आत्मसमर्पण , कुआलालंपुर में भारतीय सेना के 25 वें डिवीजन के अफसरों के समक्ष अपनी तलवारें रख कर

लेकिन 1948 के कश्मीर घटना के बाद , नेहरू जी को सेना की जरूरत महसूस हुई , लेकिन फिर भी वह बड़ी और शक्तिशाली सेना के पक्ष में नहीं थे , भारतीय नेतृत्व, भारतीय सेना के खर्चों पर कटौती करना चाहती थी , सिविल सेवकों को सेना प्रबंध में लगा दिया गया , ब्रिटिश काल में कमांडर इन चीफ ही डिफेन्स मिनिस्टर हुआ करते थे , और कमांडर इन चीफ तीन मूर्ति भवन में रहते थे , जिसे बाद में नेहरू जी के आवास में तब्दील कर दिया गया , नयी आज़ाद व्यवस्था ने सेना को राजनेताओं पर निर्भर बना दिया गया , जिसकी वजह से कुछ आतंरिक कलह बनी रही भारतीय नेतृत्व में और सेना प्रमुखों के बीच में।

एक उदाहरण के तौर पर , जनरल करिअप्पा 1948 में पूरी तरह से पाकिस्तानियों को कश्मीर से बहार कर देना चाहते थे , और इसके लिए उन्होंने कई सारे सफल अभियान चलाये, नौशेरा, झांगर, पूँछ, द्रास , और जोजिला , फिर बाद में संयुक्त राष्ट्र ने हस्तक्षेप किया , और फिर सेना मुख्यालय की तरफ से आदेश आया की कोई करवाई नहीं की जाये जब तक नए आदेश नहीं आते।

जनरल करिअप्पा ने इस बात का विरोध किया और कहा की इससे लेह और कारगिल खतरे में आ जायेंगे और कश्मीर घाटी भी , और दो बटालियन की मांग की आगे बढ़ने के लिए , लेकिन उन्हें एक ही बटालियन दी गयी , और कारगिल की तरफ कूच करने के लिए कहा गया। जनरल करिअप्पा ने आदेशों के विपरीत लेह तक पहुँच कर कब्ज़ा जमा लिया। और आज लेह लदाख और कारगिल जो भारत का हिस्सा बना हुआ है वह जनरल करिअप्पा की ही योगदान है, और जनरल करिअप्पा की बात मानी जाती तो आज पूरा कश्मीर भारत का ही होता।

जब 1949 में जब नए कमांडर इन चीफ , बनाये जाने थे , तब भारतीय नेतृत्व जनरल करिअप्पा के पक्ष में नहीं था , सब से सीनियर होने के बावजूद , जब दूसरे दो दावेदारों ने मना कर दिया तब जा के जनरल करिअप्पा को कमांडर इन चीफ बनाया गया।

1950 के चीन के तिब्बत पर आक्रमक रवैये के बाद जब कमांडर इन चीफ करिअप्पा ने कहा की हमे अपनी सेना को चीन के मुकाबले का बनना है , तब भारतीय नेतृत्व ने कहा की ” कमांडर इन चीफ हमे न बताये की हमारे दुश्मन कौन है ” , और कोई तवाज़ो नहीं दी गयी कमांडर इन चीफ करिअप्पा की बातों पर , दस साल का समय बहुत था सेना को आधुनिक बनाने एवं चीन के बराबर सुसज्जित करने के लिए।

जब सरकारी नौकरी में आरक्षण की बात आयी , तब भारतीय नेतृत्व सेना में भी आरक्षण की मांग कर रहा था , जिसे कमांडर इन चीफ करिअप्पा ने एक सिरे से नकार दिया , इसी बीच कमांडर इन चीफ करिअप्पा के सेवा-निवृत्ति के बाद इस पद को ही खत्म कर दिया गया।

भारतीय नेतृत्व की कोशिश भारतीय सेना प्रमुखों को कमजोर करने में लगी रही , इसका एक कारण दुनिया भर में उस समय हो रहे सैन्य तख्तापलट का भी था, नेहरू जी को डर लगा रहता था इस बात का।

जनरल थिमैया , नेहरू जी , वी के कृष्ण मेनन

नेहरू जी खुद कभी सहज नहीं हो पाए भारतीय सेना के अफसरों के साथ , उनकी नेतृत्व क्षमता को समझ उसका उपयोग करने की बजाये , उनकी अधोगति करने में लगे रहे। निजी तौर पर नेहरू जी उस समय के सेना के अफसरों को घमंडी , खोखला , और अपने लिए खतरा मानते थे। सेना के बजट में कटौती कर दी गयी , तनख़्वाह कम की गयी , और सेना को आधुनिक बनाने के कार्य में रोक लगा दी गयी।

1958 में जनरल थिमैया ,को सेना प्रमुख बनाया गया , जनरल थिमैया द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान युद्ध इन्फेंट्री ब्रिगेड की कमान संभालने वाले एकमात्र भारतीय थे और उन्हें भारतीय सेना का सबसे प्रतिष्ठित युद्ध कौशल वाला अधिकारी माना जाता है, जनरल थिमैया ने 1948 और 1956 युद्ध में पाकिस्तानियों को नाकों चने चबवाये थे , इनकी प्रतिष्ठिा इतनी ऊँची थी की , नेहरू जी इनसे ईर्ष्या करने लगे और उन्हें अपनी कुर्सी जाती दिखी , इससे पहले ऐसा कुछ होता और जनरल थिमैया सेना प्रमुख बनते , उससे पहले ही नेहरू जी ने अपनी गोटी के रूप में वी के कृष्ण मेनन को डिफेन्स मिनिस्टर बना दिया गया।

वी के कृष्ण मेनन का व्यक्तित्व काफी शानदार था , वो एक बहुत अच्छा वक्ता थे , और देश और विदेश में उस समय काफी चर्चा में थे , मेनन ने कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र में जो भाषण दिया , 8 घंटे चला और आज तक का सबसे लम्बा भाषण है।

टाइम मैगज़ीन के कवर पेज पर वी के कृष्ण मेनन

1958 में पाकिस्तानी सैन्य तख्ता पलट हो चूका था , और जनरल अयूब खान ने अपने आप को पाकिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया था , जब जनरल अयूब खान ने भारत पाकिस्तान साझा डिफेन्स पैक्ट की बात कही, चीन के तिब्बत प्रकरण के बाद , जिसे एक सिरे से नकार दिया गया था भारतीय नेतृत्व के तरफ से , लेकिन इस प्रकरण ने नेहरू जी को सचेत किया अपनी ही सेना के प्रति , जो बाद में उठाये गए हर कदम पर नज़र भी आया।

वी के कृष्ण मेनन ने रक्षा मंत्री बनते ही , सेना के संरचना के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी , उन्होंने सेना के भीतर वरिष्ठता प्रणाली को खत्म कर दिया, इसे पदोन्नति की योग्यता-आधारित पद्धति के साथ बदल दिया, और भारत के सैन्य कमान प्रणाली के बड़े पैमाने पर पुनर्गठन करना शुरू कर दिया , और इन सब प्रक्रिया में सेना अध्यक्ष जनरल थिमैया को अनदेखा किया गया।

इसी बीच 1958 में अक्साई चिन से खबर आयी की चीन की सड़क बन चुकी है , भारतीय नेतृत्व ने चीन से पीछे हटने को कहा , चीन ने कहा बैठ कर बात करते है , भारतीय नेतृत्व ने कहा पहले पीछे हटो फिर बात करेंगे और फॉरवर्ड पालिसी की घोषणा कर दी यह एक सामरिक रणनीत्ति थी चीन पर दबाव डालने की , नेहरू जी को लगता था की चीन आक्रमण नहीं करेगा इसलिए अपनी सैन्य ताकत और तैयारी पर ध्यान नहीं दिया , फॉरवर्ड पालिसी के तेहत अग्रिम मोर्चों पर चौकियां बनायीं जानी थी , और चौकियां बनायीं भी गयी , कुछ एक चौकियों पर पहुँचने में 18 दिन लग जाते थे। जब कुछ ज्यादा प्रतिकिया चीन के तरफ से आती नहीं दिखी तो अग्रिम चौकियों को चीन के अधिकर्त क्षेत्र में बनाने लगे, नेहरू जी ने अपना आक्रामक रुख का एहसास करा चुके थे चीन को।

1948 के बाद से दुनिया भर में स्थापित 71 संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में से 49 में 200,000 से अधिक भारतीयों ने सेवा की है। यह तस्वीर , भारतीय सेना का संयुक्त राष्ट्र आपातकालीन बल (UNEF) के रूप में 1958 में गाजा के एक समुद्र तट पर एक प्रशिक्षण अभ्यास जिसमें डेनिश और स्वीडिश शांति सैनिकों भी शामिल हुए।

जनरल थिमैया जो द्वितीय विश्वयुद्ध , 1948 और 1956 पाकिस्तानी युद्ध के हीरो थे , उनकी राय को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया ,नेहरू जी ने 1959 में संसद में घोषणा कर दी की NEFA (आज का अरुणाचल प्रदेश जिस चीन अपना क्षेत्र होना का दवा कर रहा था ) अब सेना की जिम्मेदारी है , बैगर कोई चर्चा किये ही , सेना प्रमुख के साथ , जब जनरल थिमैया ने अपनी बात रखनी चाही सैन्य तैयारियों और चीन के परिपेक्ष में तब उन्हें रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन और नेहरू जी से अपमानजनक बातें सुनने को मिली, जिससे आहत होके 1959 में जनरल थिमैया ने इस्तीफा दिया , लेकिन बाद में इंदिरा गाँधी के अनुरोध पर और नेहरू जी की बात पर इस्तीफा वापिस ले लिया गया , 1961 तक जनरल थिमैया भारतीय सेना प्रमुख बने रहे। और तब तक चीन ने हिम्मत नहीं की आक्रमण की।

जनरल थिमैया के युद्ध कौशल से दुनिया इतनी परिचित थी की उनके सेवा-निवृत्ति के तुरंत बाद ही उन्हें संयुक्त राष्ट्र सेना का प्रमुख बना दिया गया सायप्रस में ।

भारतीय नेतृत्व का भारतीय सेना प्रमुखों के साथ 1961 तक तालमेल ख़राब रहा , इसके बाद भारतीय नेतृत्व ने अपने नुमांइदों की पहचान कर ली थी सेना में , जिनके बड़बोल ने युद्ध की बनती भूमिका को और प्रबल किया , पर वो धरातल पर काम करने में पूर्ण रूप से असफल हुए , युद्ध के समय नव नियुक्त सेना प्रमुख , जो भारतीय नेतृत्व के पसंदीदा थे , अस्पताल में भर्ती हो गए थे।

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