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विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 3

Homai Vyarawalla / Public domain

1959 खत्म होते होते चीन को यह समझ आ गया था की बातचीत ही एक जरिए है , सीमा विवाद सुलझाने का , उस समय के कम्युनिस्ट नेता अजोय घोष ने चेयरमैन माओ को यह बता दिया था की यदि स्थिति और बिगड़ी तो नेहरू को जबरजस्ती अमेरिका का रुख करना पड़ेगा , और वो बाकी सांसदों , प्रेस और जनता के दबाव में आकर चीन विरोधी हो जायेंगे। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए चीन बातचीत की तरफ अग्रसर हो रहा था , इसी बीच एक ऐसी घटना हुई , जिसने इस पर अस्थाई रूप से रोक लगा दी।

कम्युनिस्ट नेता अजोय घोष


अक्टूबर में जो गोलीबारी हुई , जिसमें 9 पुलिस जवान सहीद हुए , और 10 को बंधक बना लिया गया। बंधक बनाये गए पुलिस टीम के मुखिया के साथ अमानवीय हरकते की गयी , मानसिक और शारीरिक रूप से उत्पीड़न किया गया। और जब यह खबर बहार आयी तब माहौल बहुत ही गरमा गया था , यह गोलीबारी से ज्यादा नकारात्मक एवं निंदनीय घटना बन गयी भारतीय जनमानस के बीच।

चीनी प्रधानमंत्री एनलाई चाऊ , नेहरू जी से निरंतर बात करने की बात कह रहे थे , लेकिन बात शुरू करने से पहले नेहरू जी ने शर्तें रख दी , की चीन सबसे पहले विवादित जगहों से पहले अपनी सेना हटाए फिर हम बात करेंगे। 17 दिसंबर एनलाई चाऊ ने पत्र में लिखा की , 21 अक्टूबर के किस्से के बाद चीन ने पेट्रोलिंग बंद कर दी है , और वह भारतीय प्रधानमंत्री से स्वयं मिलकर सीमा विवाद का निपटारा करना चाहतें हैं। पत्र में चीनी प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिए की वह अक्साई चीन के बदले में NEFA(आज का अरुणाचल प्रदेश ) की दावेदारी छोड़ देंगे। नेहरू जी चीनी प्रधानमंत्री से मिलना नहीं चाहते थे , और उनका यही रवैया रहा 1959 के जनवरी अंत तक , फिर कुछ मंत्रियों और चीन के भारतीय राजदूत की सलाह पर उन्होंने अपनी शर्तों में ढील देते हुए , चीनी प्रधानमंत्री से मिलने का फैसला किया।

इसी बीच रूसी प्रधानमंत्री निकिता ख़्रुश्चेव ने भारतीय सीमा पर हुई झड़पों पर नाराज़गी व्यक्त की और कहा इस तरह की घटनायें रूस और भारत के रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकती है । लेकिन उस समय के रूसी नेतृत्व का कोई प्रभाव नहीं था चीनी नेताओं पर।

रूसी प्रधानमंत्री निकिता ख़्रुश्चेव और नेहरू जी

जनवरी 1960 में चीन ने बर्मा के राजनेताओं को बुलाकर सीमा विवाद का निपटारा किया , जो बहुत लम्बे समय से चला आ रहा था , जिसे चीन ने कभी तवज्जो नहीं दी , यह सिर्फ इसलिए था की भारत भी उसी तरह ही सीमा विवाद का निपटारन करे। 5 फरवरी 1960 को नेहरू, संसद के दबाव में आकर, पत्र लिख चीनी प्रधानमंत्री को मिलने के लिए भारत निमंत्रित किया, लेकिन पत्र में यह स्पष्ट किया गया की यह निमंत्रण सीमा के बारें में कोई ठोस वार्ता के लिए नहीं क्योंकि चीन के हिसाब से पूरी सीमा का कभी सीमांकन हुआ ही नहीं था , तो यह कतई आधार नहीं बन सकता वार्ता का।
इस पत्र से नेहरू जी अपने ही लोगों को यह भी यक़ीन दिलाना चाहते की वह अक्साई चीन के बदले NEFA वाली बात पर रजामंद नहीं हो रहे है। क्योंकि की रक्षा मंत्री कृष्णा मेनोन के मुँह से यह अनजाने में निकल चूका था।
चीनी नेतृत्व ठोस वार्ता के पक्ष में दिख रहा था , और भारतीय नेतृत्व अभी इसकेलिए पूरी तरह तैयार नहीं था। नेहरू जी ने इससे पहले दो बार चीन का निमंत्रण ठुकराया था , और इसबार जब नेहरू जी ने चीनी प्रधानमंत्री को निमंत्रित किया तो वह पूरा लावलश्कर लेकर 6 दिन की भारतीय यात्रा पर आने को राज़ी हो गए। जब नेहरू जी ने अपने लोगों से चर्चा की उन्हें क्या रुख अपनाना चाहिए वार्ता के दौरान , तो सभी का सुझाव था , सीमांकन के मुद्दे पर आप अडिग़ रहिये।

चाउ एनलाई, भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा, डॉ राधाकृष्णन के साथ 1960 में नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में एक टोस्ट करते हुए , ताकि चीन-भारतीय संबंधों पर महत्वपूर्ण वार्ता में सफलता का पायी जा सके, लेकिन यह हो न सका।

20 अप्रैल से शुरू हुई चीनी प्रधानमंत्री की यात्रा विफल रही , चीनी प्रधानमंत्री ने पहले सबसे इकट्ठे बात की फिर सभी मुख्य लोगों से एक एक करके मिले , लेकिन बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला , नेहरू जी ने अक्साई चीन और NEFA पर अपना अड़ियल रुख बनाये रखा। चीनी प्रधानमंत्री एनलाई चाऊ की भारतीय यात्रा और उच्चस्तरिय बैठकें विफल रही , एक मात्र सफलता जो एनलाई को मिली वह यह थी की आगे बात जारी रखने का आश्वासन।

एनलाई द्वारा दिए गए प्रस्ताव , की वास्तविक नियंत्रण रेखा को ही सीमा मान लिया जाये और भारतीय गस्ती दल को उसके आगे नहीं बढ़ाने दिया जाये , को नेहरू जी ने एक सिरे से नकार दिया लेकिन वह इस बात पर राज़ी हो गए की उनके अधीनस्त कर्मचारी जब तक सीमा को लेकर अपने अपने दावों की पुष्टि हेतु सबूतों को इक्कठा करेंगे , तब तक गस्ती दलों पर रोक लगा दी जाएगी।

सीमा मामलों के विशेषज्ञयो की 1960 के मध्य और आखिर में हुई मीटिंग में चीनी यह दिखाने की कोशिश करते रहे की वह वार्ता के बहुत इच्छुक हैं , लेकिन अपनी ही ऐतिहासिक एवं परम्परागत तथ्यों का हवाला देते हुए अपनी कही हुई बात पर ही कायम रहना चाहते थे। दिसंबर में हुई आखरी मीटिंग में भारतीय विशेषज्ञयो को पता लग गया की , चीनियों के सबूत की प्रमाणिकता , भारतीय सबूतों के मुकाबिले में कमजोर हैं , क्योंकि भारतीय नक़्शे , इंडियन ऑफिस लाइब्रेरी , लंदन में उपलब्द थे विवरण सहित , आम जनता के देखने के लिए।
चीनियों की यह समझ में आ गया था की जितना वह सीमा को लेकर अपना मुद्दा मजबूत समझते हैं उतना ही मजबूत पक्ष भारत का भी है , लेकिन उनके यह भी समझ में आ चूका था की भारत कोई भी बड़ा सैनिक प्रयास नहीं करेगा , चीनी द्वारा अधिकृत जमीन को हासिल करने के लिए।
गस्ती बंद होने का यह मतलब नहीं था की नयी चौकियां न बनाई जाएँ , चीनियों ने इस दौरान लद्दाख के अंदर कई सारी चौकियां बनवाई , और आगे की तरफ बढ़ते रहे , इसी दौरान चीनी सीमा विशेषज्ञों ने भारतीय विशेषज्ञों को एक नया नक्शा सौंपा , जिसमें चीनी सीमा और पश्चिम की तरफ दिखाइए दी जा रही थी , 1956 के नक़्शे के मुक़ाबले जो चीनी प्रधान मंत्री ने नेहरू जी को दी थी।

8 अक्टूबर 1959 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया अजोय घोष ने चेयरमैन माओ और लिउ शाऊ ची को बताया उन खतरों के बारें में जो अगस्त में चीनी आक्रमण से उत्त्पन हुए , अजोय घोष के साथ मीटिंग में वाईस चेयरमैन लिउ ने कथित तौर पर यह कहा , “हम चिंतित है पाकिस्तान में हुए सेना द्वारा किये गए तख्ता पलट से , यह अमेरिका द्वारा खेला जा रहा खेल है , वह पुरे दक्षिण एशिया में इसी तरह कब्ज़ा कर चीन और रूस के निकटवर्ती प्रांतों में अपनेआप को शक्तिशाली बनाना चाहता है। बर्मा , जापान , पाकिस्तान , नेपाल , सीलोन (आज का श्रीलंका ), भारत और इंडोनेशिया देशों से दो साम्यवादी देश रूस और चीन घिरे हुए हैं , साम्राज्यवादी अमेरिका इन देशों में अपने हिसाब से तख्ता पलट कर अपनी सैनिक पकड़ बनाना चहाता साम्यवाद को घेरने के लिए।

पाकिस्तान और बर्मा में वह सफल हो गए है इसमें , इंडोनेशिया में कोशिश कर रहें है , और भारत में वह ऐसा ही करना चाहते हैं।

चीनी नेतृत्व की लगातार होती हुई चिंता , जनरल थिमैया का रक्षा मंत्री कृष्णा मेनोन से अनबन , चीनी नेतृत्व को डरा रही थी , चीनी अपने आप को चारो तरफ से सैन्य तानाशाहों से नहीं घिरे देखना चाहते थे।

अजोय घोष की तरह चीन का नेतृत्व को भी पता था , नेहरू जी और उनके सलाहकारों के बीच का अंतर , वाईस चेयरमैन लिउ कथित तौर पर जनरल थिमैया और विदेश मंत्रालय के अधिकारीयों को दक्षिणपंती मानते थे , जो बॉर्डर मुद्दे को लेकर अमेरिका के साथ मिलकर चीन को अलग थलग करना चाहते हैं ।

वाईस चेयरमैन लिउ ने अजोय घोष से कहा , हो सकता है नेहरू जी इन दक्षिणपंतियों की बातों में आकर , उन की तरफ रुख कर ले , और हमारी फिलहाल प्राथमिकता यह होनी चाहिए की इस चीज़ को किसी भी तरीका से होने से रोका जाये।

वाईस चेयरमैन लिउ, इंदिरा गाँधी के साथ 1954

नेहरू जी की छवि चीनी नेताओं के मुताबिक ” एक प्रतिक्रियावादी और कम्युनिस्ट विरोधी की थी ” , फिर भी वह बेहतर थे चीन के लिए ,जनरल थिमैया जैसे सख्त चीन विरोधियों की अपेक्षा।

चीनी नेतृत्व , भारत में पाकिस्तान और बर्मा की तरह सैन्य शासन नहीं चाहता था, इसकलिये उन्होंने कम्युनिस्ट नेता अजोय घोष को नुस्खा दिया , जिसके अनुसार।
1, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया को कांग्रेसी सरकार को पूरा समर्थन देना था , दक्षिणपंती सेना प्रमुख से अर्थात जनरल थिमैया से।
2, उचित समय आने पर जन मानस से दबाव डलवाकर नेहरू जी पर सीमा मसले को बातचीत से हल करना था।

जहाँ तक पहले नुस्खे का सवाल था , भारतीय कम्युनिस्ट दल दो भागों में बटें हुए थे पहला रूसी समर्थक और दूसरा चीन समर्थक , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सीमा विवाद पर तटस्थ बनी रही , लेकिन 21 अक्टूबर की घटना के बाद 14 नवंबर को जनमानस के दबाव में आकर मक्मोहन रेखा पर भारतीय दावे का समर्थन करने लगी , जिस वजह से उन्हे कोई मौका मिला नहीं।

चीनी आकाओं की बेरूखी पर पलटे कम्युनिस्ट पार्टी मुखिया अजोय घोष द्वारा जारी किया गया वक्तव्या


दूसरे नुस्खे पर चीनियों को खुद भी कुछ पहल करनी चाहिए थी , लेकिन वह अपना पक्ष कमजोर करके आगे बढ़ने को राजी नहीं थे , इसी बीच भारतीय चौकियों में तैनातगी बड़ा दी गयी थी , चीनियों की संख्या देखते हुए , तो यह कोई अनुकूल परिस्थिति नहीं थी चीनियों के लिए दुबारा वार्ता शुरू करने के लिए , क्यूंकि चीनी बिना शर्त , अपने अनुकूल माहौल में बातचीत शुरू करने के इच्छुक थे। चीनी फ़ौजिओं को भारतीय गस्ती दल को चेतावनी देने के लिए कहा गया।
19 अक्टूबर 1959 को चीनी प्रधानमंत्री ने पत्र लिख नेहरू जी को बताया की वह उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन को चीन निमंत्रित करना चाहते हैं वार्ता के पहले चरण के रूप मैं , लेकिन जब यह पत्र 24 अक्टूबर को पहुंचा तब , 21 अक्टूबर को हुई कोंग्का की घटना जिसमें 9 पुलिस कर्मी मारे गए और 10 पकडे गए , से नेहरू जी और उपराष्ट्रपति बहुत नाराज़ थे , और उन्होंने प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
7 नवंबर को फिर चीन के प्रधानमंत्री ने नेहरू जी को खत लिखा और कहा की मुलाकात बहुत जरूरी है , तो निकट भविष्य में समय निकल कर उनसे मुलाकात करें। चीनी प्रधानमंत्री ने निकट भविष्य में सीमा पर होनी वाली घटनाओं के प्रति नेहरू जी को आगाह किया। उन्होंने लिखा की “सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य ” , दोनों पक्षों के लिए यह है की वह पूर्ण उन्मूलन करें उन कारणों का जो भविष्य में सीमा पर संघर्ष का कारण बन सकते हैं। और अनुकूल माहौल बनाने के लिए मक्मोहन रेखा से दोनों सेनायें 12 किलोमीटर पीछे हटे , और गैर सैनिक क्षेत्र को असैनिक प्रशासन के अंतरगर्त रखा जाये।


नेहरू जी की पहली प्रतिक्रिया यह थी की अभी समय अनुकूल नहीं है , लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने दरवाजे बंद नहीं किये , उन्होंने जनमानस को यह बताया की 9 नवंबर को नेहरू जी ने कहा की “पत्र की भावना खराब नहीं है “।
इसी बीच जब बातचीत का माहौल बनता दिख रहा था , तब चीनियों ने अपना माओवादीपन दिखा दिया , जिसने साफ होते माहौल को फिर धूमिल कर दिया। १२ नवंबर को चीनी विदेश प्रवक्ता ने यह सूचना दी की , 21 अक्टूबर को पकडे गए 10 और हताहत हुए 9 सैनिकों (गस्ती पुलिस ), को भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया जायेगा , 14 नवम्बर को कोंग्का पास के निकट भारतियों को सौंप दिया गया , साजो सामान के साथ २० दिन बाद।

1959 में हुई घटना में हताहत और पकडे गए CRPF के जवान

नई दिल्ली को पहले से ही शक था की पकडे गए सैनिकों के साथ माओवादी तरीके से पूछताछ हो रही होगी , दिमाग धोने के नायब तरीके अपनाये जा रहे होंगे , बीस दिन चीनी कब्जे में रहने के बाद , जब पुलिस गस्ती के मुखिया करम सिंह से घटना के बारें में पूछा गया तब उन्होंने चीन की भाषा बोलते चीनी पक्ष को मजबूत किया। जब संसद को माओवादी तरीके से किये गए दिमाग धोने वाली प्रक्रिया का पता चला , तब संसद में उबाल आया चीन के प्रति।
17 नवंबर को विदेश मंत्रलय ने वक्तव्य जारी किया , जिसमें करम सिंह के साथ किये गए अमानवीय अत्याचारों का जिक्र किया गया , चीन द्वारा अपनी बात मनवाने के लिए । करम सिंह के निजी वक्तव्य को शामिल किया जो संसद में पेश किये गए , सीमा विवाद पर दिए गए स्वेत पत्र 3 के 10 से लेकर २२ पृष्ठों तक।
भारतीय नेताओं ने चीनी प्रधानमंत्री की बातचीत की पहल को ख़ारिज कर दिया , 7 नवंबर के पत्र में कुछ नयी शर्तों के साथ बातचीत की बात कही गयी , इस जवाब को ग्रह मंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने लिखा था और नेहरू जी की सहमति के बाद 17 नवंबर को भेजा गया , जिसके अनुसार
1, चीनी सैनिक NEFA(आज के अरुणाचल प्रदेश ) स्तिथ लोंगजू से हट जायेंगे , और भारतीय सैनिक उस पर दोबारा काबिज नहीं होंगे (जबकि यहाँ पर भारतीय सीमा सुरक्षा बल के लोग पहले तैनात थे , जिन्हे चीनियों ने भारी गोलाबारी करके छोड़ने में मजबूर कर दिया था )
2, लद्दाख का क्षेत्र, जिसपर भारत ने अपना दावा पेश किया वहां से चीन अपने सैनिको को हटा लेगा और भारत अपने सैनिकों को वहां से हटा लेगा जिस पर चीन ने दावा किया ( लदाख और अक्साई चीन को सैन्य मुक्त किया जाये वार्ता से पहले )
3, निजी बातचीत चीनी प्रधान मंत्री के साथ की जा सकती है , शुरूआती दौर जब तक एक अंतरिम समझ नहीं बन जाती तनाव को कम करने के लिए।
४ , अग्रिम चौकी को पीछे हटने की जरूरत नहीं है १२ किलोमीटर , बस गश्ती बंद कर दी जाएँ , क्योंकि १२ किलोमीटर पीछे हटने का मतलब है करीब ५ दिन का पैदल रास्ता NEFA में।

लोंगजू पोस्ट

नेहरू जी के प्रति-प्रस्ताव ने ऐसी नीत्ति को जन्म दिया , जिससे किसी भी तरह की सैन्य करवाई करना संभव नहीं था और सीमा विवाद को लम्बे समय तक खींचा जा सकता था , और मामले को सुलझाने के लिए निपुण राजनीतिक पैंतरेबाज़ी की जरूरत होती । इस पत्र से नेहरू जी ने अपने विरोधियों का मुँह बंध किया , कुछ समय तक।
17 दिसंबर को नेहरू जी के पत्र का जवाब देते हुए चीनी प्रधानमंत्री ने अपना रुख और कड़ा किया, अक्साई चीन के वास्तविक नियंत्रण को लेकर , उन्होंने भारतीय अख़बार में नेहरू जी के प्रति -प्रस्ताव पर लिखे लेख का हवाला देते हुए कहा , पूरी लद्दाख से सेना हटाना सैद्धांतिक रूप से हमारे लिए कारगर नहीं है , क्योंकि पहली बात आपकी कोई सेना वहां पर है ही नहीं , दूसरा इस पुरे क्षेत्र में हमारा कब्ज़ा है , हमारे सैनिक इसकी सीमा की सुरक्षा कर रहे हैं , शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ती जो हमने सड़क बनाई है , यह हज़ारों साल से , चिंग साम्राज्य के समय में भी शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने वाला यह रास्ता हुआ करता था , यह हर समय से चीनी अधिकार क्षेत्र में रहा है , 1950 के तिब्बत पर अधिकार करने के बाद से इसी रस्ते सज्जो सामान शिनजियांग से तिब्बत आता है , 1956 में हमने इस पर सड़क बनानी शुरू की , और नई दिल्ली सितम्बर 1958 तक अनिभिज्ञ रही इन सब बातों से। हमारे पास ऐसे सभी सबूत हैं जो यह सिद्ध करते हैं की यह सालों से हमारे अधिकार क्षेत्र में रहा है, न की भारतीय अधिकार क्षेत्र में ।
इसके बाद चीनी प्रधानमंत्री ने दो प्रस्ताव दिए,
1 , वह राज़ी हो गए लोंगजू चौकी ( जिस पर चीनियों ने अगस्त 1958 में कब्ज़ा कर लिया था ) से पीछे हटाने को , बशर्तें भारत भी 10 विवादास्पद चौकियों को खाली कर पीछे हटे।
2, प्रधानमंत्री स्तर की बैठक जल्द से जल्द हो , इस बार उन्होंने तारीख और जगह का भी जिक्र किया 26 दिसंबर को रंगून या बीजिंग में जिससे ” मूल सिद्धांत पर, जिससे आगे की करवाई चलेगी उस पर समझौता हो सके ” , जिसका अनुचरण अधीनस्त लोग करेंगे सीमा निर्धारण के दौरान।


चीनी प्रधानमंत्री ने यह कहा की , नेहरू की अक्साई चीन से पीछे हट जाने की बात अनुचित है क्योंकि चीन ने यह कभी नहीं कहा की NEFA, जिस पर हमारी दावेदारी है , उससे भारत पीछे हटे तब बात करेंगे। इस पत्र में चीनी प्रधानमंत्री ने पहले से ज्यादा संकेत दिया इस बात पर की वह अपनी दावेदारी NEFA, पर छोड़ने को तैयार हैं यदि भारत अक्साई चीन की छोड़ता है तो। चीनी प्रधानमंत्री ने लिखा ” महामहिम आप जानतें है की मक्मोहन कही जाने वाली रेखा को न ही हमने और न ही हमारी किसी पुरानी सरकार ने माना है , फिर भी एक अच्छे पडोसी ने नाते हमारे सैनिकों ने कभी इस सीमा को पार नहीं किया है।
चीनी एक तरफ बात करने को बेताब थे दूसरी तरफ अक्साई चीन को लेकर उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं था , इस बात से बातचीत में गतिरोध बना रहा और नेहरू जी ने चीनी प्रधानमंत्री के सभी प्रस्तावों को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया । नेहरू जी के इस अडिग आधिकारिक स्तिथि की वजह , कैबिनेट मीटिंग , प्रेस और जनता का दबाव था , जब नेहरू जी से विपक्षी दल के नेता ने चीन से सुलहनामे पर सवाल किया , तो नेहरू जी गुस्से से बोले , दो ही विकल्प हैं , ” वार्ता या युद्ध ” , और में वार्ता , वार्ता , और वार्ता ही करता रहूँगा आखिर तक। २२ दिसंबर को जब यह सुझाव दिया गया की “पुलिसिया करवाई करके चीनियों को भगा दिया जाये ” तो नेहरू जी चौंके और बोले , दो बड़े देशों में छोटे छोटे युद्ध नहीं हो सकते , पुलिसिया करवाई छोटे विरोधी पर ही कारगर हैं न की चीन जैसे शक्तिशाली देश के खिलाफ , ऐसी करवाई कभी न खत्म होने वाला युद्ध प्रारंभ कर सकता है।

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 1

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 2

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 3

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 4

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विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 2

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