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विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 4

1959 के अंत तक चीनी प्रयास जारी रहे गतिरोध के दौरान भी, वह जल्द से जल्द  प्रधानमंत्री स्तरीय बैठक चाहते थे भारत के साथ , चीनी अपने इस मूल सिद्धांत पर नेहरू जी को राजी करना चाहते थे की सीमा का सीमांकन कभी हुआ ही नहीं है , सहमति होने के बाद सीमा मामलों के विशेषज्ञों की  उप समिति बाकी सीमांकन का कार्य कर लेगी।  जब भारत की ओर से बार बार  यह पूछा गया चीन से की उनके “मूल सिद्धांत” का आधार क्या है , इसके जवाब में चीनी सरकार ने यह कहा , ” हमे खेद हैं ” के इसकेलिए हमे बहुत विस्तार में जाना पड़ेगा ” और कुछ एक बातों को आप बहस से अलग ही नहीं कर सकते हो “, और इसी के लिए हम एक उच्चस्तरीय मीटिंग चाह रहें है।    
इस बार चीनी पत्र थोड़ा सा सामान्य नज़र आ रहा था   , चीनियों ने पडोसी देशों में चल रहे चीनी विस्तारवाद को लेकर, उपजे डर को दूर करने की कोशिश की और कहा ” चीन का अपने पडोसी देशों के साथ आक्रामक होना ” असंभव , अनुचित और अनावश्यक है “, आखिर में चीनियों ने भारतीय दावों को ब्रिटिश नीत्ति का हिस्सा बताया “आक्रामक और विस्तारवादी ” , ताकि भारतीय बहस की शुरुआत ब्रिटिश दौर के तिब्बत से शुरू हो।

सिक्किम के आखिरी राजा पलडेन थोंडुप नामग्याल और महारानी होप कुक

इसके बाद चीनी पत्र ने भूटान और सिक्किम का जिक्र किया और कहा , भूटान के साथ लगी हुई मक्मोहन रेखा में,  परिसीमन को लेकर एक निश्चित विसंगति है , जिससे दूर कर लिया जायेगा , सिक्किम(सिक्किम अलग देश हुआ करता था तब ) का सीमांकन पहले ही हो चूका है , तो कोई मामला ही नहीं बनता चीन और सिक्किम के बीच में।  इसलिए, यह आरोप की चीन , भूटान और सिक्किम का अतिक्रमण करना चाहता है “सरासर बकवास है ” , इस तरह से चीन ने लगातार इन बॉर्डरों से मिल रही रिपोर्टों का खंडन किया।   इसके बाद चीन ने अपनी स्तिथि को स्पष्ट करते हुए ऐतिहासिक एवं कानूनी प्रमाण दिए अपने दावे को सिद्ध करने के लिए।  
26 दिसंबर के इस पत्र ने नेहरू जी के सामने कई प्रश्न रखे ” क्या पूरी सीमा के बारे में यह मान लिया जाये की इसका सीमांकन ही नहीं हुआ है, और कोई कदम न उठा कर कहीं हम चीन के  कदम को मजबूत तो नहीं कर रहे , या फिर हम इसी तरह कागजों पर बहस ही करते जाएँ लम्बे समय तक ” नेहरू जी ने फिर संसद , प्रेस और जनमानस के दबाव के बारें में सोचा और उन्हें “इसी तरह कागजों पर बहस करते जाएँ ज्यादा कारगर लगा”। नेहरू जी को संज्ञान था इस बात का की लम्बे अंतराल में ” NEFA भारतीय और अक्साई चीन , चीन का ही हिस्सा बनेगा”।  
 26 दिसंबर के चीनी पत्र के बारे में औपचारिक रूप से प्रेस कांफ्रेंस में बोलते हुए नेहरू जी ने कहा की ” मिल कर ,बातचीत कर मामले को निपटने चाहते है और कहा की माहौल सही होना चाहिए , ताकि सही परिणाम निकलकर आये।  
नेहरू जी को माहौल सही नहीं लग रहा था बातचीत के लिए , क्योंकि बहुत ज्यादा अन्तर था सीमा के चीनी और भारतीय स्तिथि में , चीनी पत्र विवादपूर्ण था , नेहरू जी को समय चाहिए था जवाब ढूंढने के लिए। 12 जनवरी को  मास्को और बीजिंग के राजदूतों को नई दिल्ली बुलाया गया और विदेश मंत्रालय के अधिकारीयों को और अन्य दूतावास अधिकारीयों को बड़े पैमाने मैं साक्ष्य इकट्ठा करने के लिए कहा गया , ताकि चीनी दावों का खंडन किया जा सके।  
मास्को और बीजिंग के भारतीय राजदूतों ने पूछे जाने पर , नेहरू जी को बात करके इससे मसले का निपटारन करने की सलाह दी , लेकिन दोनों राजदूतों की वजह अलग अलग थी।  चीन के भारतीय राजदूत पार्थसारथी ने  बताया की आने वाले भविष्य में असली खतरा चीन की असैनिक विस्तारवादी नीत्ति से है , इसलिए ज्यादा समय और दिमाग सामरिक मुद्दों पर न लगाया जाये जिससे आने वाले भविष्य की महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्ध से हमारा दिमाग हट जाये।  पार्थसारथी रक्षा मंत्री कृष्णा मेनोन के शागिर्द थे , पार्थसारथी और कृष्णा मेनोन ही दो ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सीमा पर अगस्त और अक्टूबर में हुई घटना को “दुर्घटना हो सकती है बताया”।  

बीजिंग स्तिथ भारतीय दूतावास के राजदूत , श्री गोपालस्वामी पार्थसारथी


मास्को के राजदूत ने कहा की रूस जितना कर सकता था , उसने उतना किया , इससे ज्यादा की उम्मीद रूस से करना बेकार होगा रूस के नेता ख़्रुश्चेव को बखूबी पता था अपनी असमर्थता का , चीनी उनके प्रभाव में आने वाले नहीं थे , फिर भी वह अपने भाषणों में भारत का साथ निभाते दिखे , अक्टूबर वाली कोंग्का घटना पर बोलते हुए ख़्रुश्चेव  ने कथित रूप से यह कहा ” यह बड़े ही दुःख की बात है की लोग हताहत हुए , हमे ख़ुशी होगी यदि इसकी पुनरावृत्ति न हो निकट भविष्य में , और  सीमा मामले को यदि मैत्रीपूर्ण वातावरण में  बातचीत कर निपटरा कर दिया जाये तो।  फिर उन्होंने कहा ” यह बड़ा ही उदास और बेवकूफी वाला  किस्सा है , किसी को पता ही नहीं सीमा कहाँ है , वहां जहाँ कोई रहता ही नहीं , आगे बोलते हुए बोले ” सोवियत संघ का जब ईरान से सीमा को लेकर मतभेद थे , तब हमने इसे मिल  बैठकर सुलझा लिया था, हमे जितना मिला उससे ज्यादा हमने दिया , सोवियत संघ को कुछ किलोमीटर आये या गए क्या फरक पड़ता है।  इन  टिप्पणियां को लेकर लोगों की अलग अलग समझ रही।  चीन को इस बात का बुरा लगा जब  ख़्रुश्चेव ने यह कहा की बंजर जमीन जहाँ कोई रहता नहीं उस जगह के लिए लड़ना ठीक नहीं।  
रूसी राजनयिकों ने भारतीय राजनयिकों को बताया की रुसी मध्यस्थता , चीन को उचित स्तिथि पर लेकर आएगी , मध्य नवंबर में रूसी कल्चरल  काउंसलर  एफिमोव ने भारतीय अधिकारियों को बताया की 7 नवंबर को चीनी प्रधानमंत्री द्वारा भेजे गए पत्र की  सलाह रूस ने ही दी थी। जब पूछे जाने पर की यह कैसे किया गया तब जवाब आया की हमने सीधे हस्तक्षेप नहीं किया , बस सीमा को लेकर बन भारतीय भावनाओ से चीनियों को अवगत कराया।  बीजिंग में रूस के नव नियुक्त राजदूत चेर्वोनेको ने भारतीय राजदूत पार्थसारथी के साथ बातचीत में कहा ” चीन का सीमा को लेकर दावा ” विवादास्पद इतिहास से भरा पड़ा है” ।  

चीन और रूस के बीच की विवादित सीमा See page for author / Public domain wikipedia


रूसी प्रमुख  ख़्रुश्चेव ने 22 नवंबर 1959 को मौखिक संदेश भेजा , मास्को स्तिथ भारतीय राजदूत के माध्यम से जिसमें कहा  ख़्रुश्चेव के कहा की उन्होंने चीन को मैत्रीपूर्ण सलाह दी है की इस सीमा विवाद को बातचीत कर सुलझा दिया जाये।  ख़्रुश्चेव ने जल्द से जल्द बातचीत शुरू करने पर भी जोर दिया।  

इन दोनों राजदूतों की बातों ने नेहरू जी को अपने पहले वाली शर्तों के बैगर ही बातचीत शुरू करने के लिए प्रेरित किया , 23 जनवरी 1960 को विदेश सचिव दत्त ने बताया की नेहरू जी अप्रैल के अंत में चीनी प्रधानमंत्री से मुलाकात करने की सोच रहा हैं।
इसी बीच रूसी प्रमुख ख़्रुश्चेव ने नेहरू जी से जाकर्ता जाते समय दिल्ली रुक मुलाकात की इच्छा व्यक्त की।  भारत ने अपना पक्ष मजबूत करने के लिए इतिहासकारों और अन्य विशेषज्ञ की टीम बनाई , जिसके मुखिये थे डॉक्टर S गोपाल  , जो लंदन गए दस्तावेज इकट्ठा करने , और जो बाद में सीमा विशेषज्ञ के टीम में शामिल हुए , जिन्होंने सीमा मामले पर चर्चायें की।  नेहरू जी चाहते थे की रूसी प्रमुख ख़्रुश्चेव के आने से पहले उनके पास सभी सबूत हो जिससे वह अपनी दावेदारी मजबूत कर सके।  इस बीच यह भी चर्चा का विषय था की 26 दिसंबर के चीनी पत्र का क्या एक विस्तृत जवाब देना चाहिए या नहीं।  
नेहरू जी और चीनी प्रधानमंत्री की बैठक का निर्णय 2 फरवरी 1960 को विदेशी मामलों की उपसमिति की बैठक में लिया गया।  जब नेहरू जी ने इस बात की घोषणा की बैठक बिना पुरानी शर्तों के हो रही है तब भारतीय ग्रहमंत्री पंत जी इसका विरोध किया। जिसका जवाब देते हुए नेहरू जी ने दो बातें कही, 1, इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है , यदि हम नहीं मिलेंगे तो फिर एक पत्र और आएगा फिर यह ऐसे ही लम्बे समय तक चलता रहेगा।  2, हमारे ऊपर बहुत दबाव है , यदि हम मुलाकात को अस्वीकार करते जायेंगे , थो हमे ही गलत समझा जायेगा।

नेहरू जी और गोविन्द वल्लभ पंत जी



1959 से पहले तक बर्मा पीछे पड़ा रहा चीन के सीमा विवाद के निपटारन के लिए , चीन और बर्मा के बीच करीब 1600 किलोमीटर की सीमा है ,1956 में बर्मा के राजनयिकों ने चीनी प्रधानमंत्री से आग्रह किया एक संयुक्त समिति बनाने का जो सीमा पर विवादित क्षेत्रों को चिन्हित कर , सीमा विवाद का निवारण कर सके  , बार बार कोशिशों के बाद भी चीन के प्रधानमंत्री अपने पक्ष से ठस से मस नहीं हुए , जिससे बर्मा को लगने लगा था की सीमा विवाद का कोई नतीजा नहीं निकलेगा।  चीन बर्मा से लगे हुए यूनान प्रदेश की सीमा को सीमांकित नहीं मानता था, जबकि 1941 में ब्रिटिश सरकार (तब बर्मा में राज करने वाली ) और तत्कालीन चीनी सरकार के बीच 1941 में सीमा रेखा को लेकर सहमति बन चुकी थी।  लेकिन 1949 के तख्ता पलट के बाद आयी चीनी सरकार ने उसे अनदेखा कर अपने सैनिकों की तैनातगी सहमत रेखा के बहार बर्मा के क्षेत्र में कर रखी थी।  
बर्मा के नए प्रधान मंत्री जनरल बा स्वे (उस समय के वर्तमान प्रधानमंत्री यू नू , ने अपना पद छोड़ , बा स्वे को कुछ समय (9 महीने )के लिए प्रधानमंत्री बनाया , ताकि वह कमजोर हो रही अपनी पार्टी को मजबूत कर सके ) पीछे हटने को तैयार नहीं थे , 1956 की गर्मियों में बर्मा के अख़बारों ने चीन द्वारा अतिक्रमण की खबरें छापनी शुरू कर दी , जिसमे यह सन्देश दिया गया की यदि जल्दी सीमा मामले का निपटारन नहीं किया गया तो जनरल बा स्वे चीन के साथ दुश्मनों वाला व्यवहार करेंगे।  22 अगस्त 1956 को जनरल बा स्वे ने चीनी प्रधानमंत्री एनलाई को पत्र लिखा और कहा की “1941 की रेखा ” को मान चीन अपनी सेना, सीमा  रेखा से पीछे हटा ले अन्यथा संभावना बन सकती है लम्बी दुश्मनी की , दोनों देशों के बीच , जनरल बा स्वे ने सचेत किया की यदि जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो ३० अगस्त में होने वाले संसद बैठक में वह इस बात की उद्घोषणा कर देंगे की बर्मा की सरजमीं पर चीनियों ने घुसपैठ कर ली है।  इसलिए ३० अगस्त से पहले सेना को  पीछे हटा ले और यदि यह इतनी जल्दी कर पाना संभव नहीं तो कम से कम इसकी सूचना की यह कब तक हो जाएगा , हमे 30 अगस्त से पहले तक मिल जानी चाहिए।  


बर्मा से कभी चीनी नेतृत्व को ऐसा मुंहफट स्पष्टवादी पत्र नहीं मिला था , चीनी प्रधान मंत्री समझ गए थे की जनरल बा स्वे पीछे हटने वालों में से नहीं है।  
इसी बीच भारत और इंडोनेशिया के प्रधानमंत्रियों के पास बर्मा में चल रहे घटना क्रमों की सूचना पहुंचा दी गयी , चीनी प्रधानमंत्री बर्मा द्वारा चलाये जा रहे प्रेस मुहिम से परेशान थे , उन्हें यह चिंता होने लगी की कहीं यह मुद्दा कोलोंबो पावर्स ( 1949 में बनाइये दक्षिण एशिया देशों की संस्थान जिसका मुख्या उद्देश्य था कम्युनिस्ट ताकतों के विस्तारवादी इरादों से अपने आप को और सदस्य राष्ट्रों को बचाना) के बीच तो नहीं रख दिया जायेगा।  चीनी बर्मा मामले को भारत और इंडोनेशिया से दूर रखना चाहता था , जनरल बा स्वे के अटल व्यव्हार और न झुकने की प्रवर्ति ने चीन को मजबूर किया अपने सैनिकों को पीछे हटाने के लिए।  
इसी दौरान चीन ने बर्मा के सर्वोच्च नेता यू नू  को प्रतिनिधि-मंडल के साथ बीजिंग निमंत्रित किया , क्योंकि यू नू का रुख सीमा मामले को लेकर इतना कठोर नहीं था जितना जनरल बा स्वे का था।  यु नू  , बा स्वे का सीमा को लेकर संजीदगी समझते थे , इसलिए उन्होंने कहा की में आपके निमंत्रण पर आ तो जाऊँगा पर आधिकारिक रूप से नहीं।  
“बर्मा को लगा की अनौपचारिक प्रस्ताव से सीमा विवाद को स्वीकार करने की स्तिथि में लेकर आया जा सकता है” , और चीन ने भी यही भ्रम की स्तिथि बना कर रखी।  
चूँकि की चीनी सेना पीछे हट चुकी थी तो बर्मा के अख़बारों ने भी चीन विरोधी लेख छापने बंद कर दिए , तो चीन ने भी पुरे मामले को ठन्डे बास्ते में डाल  दिया , फरवरी 1957 को यु नू दोबारा से बर्मा के प्रधानमंत्री बन गए , और चीन के सामने जनरल बा स्वे के रूप में उभारी चुनौती भी खत्म हो गयी।  
बर्मा के प्रधानमंत्री यु नू ने मार्च 1957 में  करीब 11 दिन बिताये चीन में सीमा विवाद के निपटारन के लिए लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला , 9 अप्रैल 1957 में प्रधानमंत्री ने प्रेस वार्ता में बताया की ” दो तीन मसले है , जिसमें एक राय नहीं बन पा रही है , थोड़ा समय लगेगा “, आगे बोलते हुए उन्होंने कहा की ” बड़ी समस्यों के आसान समाधान नहीं होते है “, इसी बीच चीनियों ने और फेरबदल कर दी नक़्शे में अपने सामरिक फायदे के हिसाब से।  चीनी प्रधान मंत्री अब अपने दावों पर अडिग हो गए थे , और उन्होंने सीमा पर कोई बात करने के लिए माना कर दिया।  

बॉर्डर पर लगे लाल बिंदु विवादित क्षेत्र है आज तक चीन और बर्मा के बीच


यह प्रधानमंत्री यु नू के लिए यह बहुत बड़ा झटका था।  
बर्मा और बाकि दुनिया को यह दिखने के लिए की चीन अपनी तरफ से इस मुद्दे को टालने की कोशिश नहीं कर रहा है , 9 जुलाई 1957 को चीनी प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय जन कांग्रेस की  बैठक में कहा की ” एक अच्छी शुरुआत हुई हैं ” बर्मा के साथ सीमा विवाद निपटारन की,  जल्द ही हम दोनों देश कुछ एक मुद्दों को बातचीत से सुलझा लेंगे , हम विस्तृत , निष्पक्ष और उचित समाधान की तरफ पहुँच रहे हैं।
बर्मा के बीजिंग स्तिथ राजदूत “हला मांग” को लेकिन यह यकीन हो गया था, सीमा में हो रही चीनी गतिविधियों से  की नवंबर 1956 में की गयी बातों से चीन पीछे हट रहा है।  
जब जुलाई 1957  के आखिर में चीन के प्रधानमंत्री का पत्र बर्मा पहुंचा , जिसमें चीन ने पहले से ज्यादा दावा पेश किया सीमा से लगी जमीन को लेकर , तो यह बात साफ़ हो चुकी थी की चीन अपनी बातों से पलट चूका था।  
1958 में भी बर्मा ने अपनी कोशिशें जारी राखी लेकिन चीन ने उत्तर बर्मा में रह रहे तिब्बतियों का हवाला देते हुए और जमीन पर दावा पेश किया , और गतिरोध बना रहा।  
बर्मा के साथ चीन जिन बातों का हवाला दे रहा था , चीन उसे बाद में भारत के साथ अपनाना चाहता था , सीमा मामले का निपटारन के समय।  
चीनी नीत्ति हिमालय के सीमा को लेकर , तिब्बत के साथ जातीय और ऐतिहासिक संबंध वाले क्षेत्रों को तिब्बती कह कर भुनाने की थी।  
इसके बाद फिर जुलाई 1958 में बर्मा के अख़बारों ने चीन के खिलाफ फिर से  लिखना शुरू कर दिया , जिसे देख सिर्फ दिखावा करने के लिए चीन ने सीमा मामले मैं बर्मा के साथ बैठक कर , अपने प्रति उठ रही तीखी प्रक्रिया को शांत किया , जब मामला शांत होता दिखा, तब चीन ने फिर से इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।    
जनवरी 1959 में फिर से नयी शुरुआत की गयी , बर्मा के नए प्रधानमंत्री ने विन द्वारा , इस बार के प्रधानमंत्री का रुख पहले वाले प्रधानमंत्री से ज्यादा कड़ा था , जब कोई सकारत्मक जवाब नहीं मिला बीजिंग से तो बर्मा के प्रधानमंत्री ने धमकी दे डाली की चीन के नागरिक उड्डयन अधिकार को बर्मा में ख़त्म कर दिया जायेगा , और सीमा में कड़ा रुख अपनाएंगे चीनी सैनिकों के खिलाफ।

बर्मा के प्रधानमंत्री , ने विन , जिन्होने धमकी दी चीन को


अगस्त और अक्टूबर में हुई भारत सीमा की घटनाओं के बाद चीनी नेतृत्व ने बर्मा सीमा विवाद के निपटारन के फायदे और नुकसान की समीक्षा शुरू कर दी।  समीक्षा से उन्हें पता लगा की बर्मा के साथ सीमा विवाद के निपटारन के बाद , भारत के लिए अपने दावों पर बने रहना कठिन हो जायेगा।  
इसके बाद चीनी सरकार ने बर्मा के साथ सीमा विवाद को निपटने के लिए गतिविधियां तेज कर दी , जनवरी 1960 को बर्मा के प्रधानमंत्री को बीजिंग में निमंत्रित किया गया ताकि चीनी सरकार सीमा को लेकर अपनी स्तिथि को स्पष्ट कर सके और दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच “मूल सिद्धांत ” को लेकर समझौता हो सके , जिसपर आगे काम हो सके।  चीन के सरकारी अख़बार ने इस पर लिखा “यह समझौता साबित करता है कि किस तरह , सीमा जैसे जटिल मुद्दे का व्यावहारिक और अनुकूल समाधान त्वरित निकला जा सकता है , यदि प्रधानमंत्री स्तर पर “मूल सिद्धांत” पर सहमति बने पहले , और फिर उसके बाद दोनों पक्षों के प्रतिनिधि एक ठोस समझौते तक पहुँच सकते हैं “
यह बात नेहरू जी 21 दिसंबर 1960 की बात की काट करने के लिए कही गयी थी , नेहरू जी ने कहा था की “मूल सिद्धांत ” पर बात करना व्यर्थ है ,  जब चीन  तथ्यों को ही मानने को तैयार नहीं। 

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 1

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 2

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 3

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 4

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