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विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 2

इतिहास का पहला सशस्त्र संघर्ष भारत चीन के बीच में 25 अगस्त 1959 को हुई , चीनी सैनिकों का 12 भारतीय सैनिकों के बीच गोलीबारी की घटना हुई , मैयितुं के दक्षिणी भाग में , उसके दूसरे दिन यानी 26 अगस्त को करीब चीनी 200 चीनी सैनिकों की टुकड़ी ने मैयितुं के दक्षिणी भाग में स्तिथ भारतीय चौकी लोंगजू को घेर कर भारी गोलीबारी की गयी और 4 भारतीय सैनिकों को पकड़ लिए गया और लोंगजू पर कब्ज़ा कर लिया । 28 अगस्त को नई दिल्ली ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की और की “यह एक जानबूझकर की गयी आक्रामक करवाई है जिसकी हम निंदा करते हैं”।
इस घटना से पहले तक नेहरू जी ने कोशिश की कोई ऐसी बात न करें जिससे चीन की नाराज़गी झेलनी पड़े। उदहारण के लिए , २० अगस्त को , नेहरू जी ने अमेरिकी राजदूत बंकर से कहा की भारतीय प्रतिनिधिमंडल संयुक्त राष्ट्र में तिब्बत मामले में चीन की निंदा नहीं करेगा , फिर नेहरू जी ने 25 अगस्त को संसद में बताया की उन्हें नहीं लगता की चीनी सैनिक तिब्बतियों का पीछा करते करते भारतीय सीमा में घुसते होंगे , जबकि ऐसी कई सारी खबरें पहले आ चुकी थी। लेकिन लोंगजू की घटना पर पर्दा डालना मुश्किल था , लोंगजू पर चीनियों ने कब्ज़ा कर लिया था, यह माफ न किया जा सकने वाला आधिकारिक रूखापन और राजनीतिक अयोग्यता बन सकती थी।

लोंगजू पर चीनियों ने कब्ज़ा कर लिया था , 28°38’00.0″N 93°33’00.0″E


28 अगस्त को जब नेहरूजी संसद में पहुंचे , तब उत्सुक सांसदों ने कई सवाल पूछे जैसे ” क्या बम का प्रयोग कर के चीनी घुसपैठियों को भगाया जा सकता है। ” यदि भारत जैसा विशाल देश अपनी सीमा की रक्षा नहीं कर सकता तो उन छोटे देशों का क्या होगा जो भारत की तरफ देखते हैं , दिशा निर्देशों के लिए ” , नेहरू जी ने शांति से सवालों के जवाब दिए और फिर से पुष्टि की , यदि कोई भूटान और सिक्किम (उस समय अलग देश था ) की अस्मिता को चुनौती देगा तो उसे भारतीय अस्मिता की चुनौती मानी जाएगी। किसी सांसद के सुझाव से नेहरू जी ने भी इस बॉर्डर मसले पर “स्वेत पत्र” जारी करने की इच्छा जाहिर की।

23 जून 1959 को चीन द्वारा यह कहा गया की भारतीय सैनिकों ने मैयितुं पर कब्ज़ा कर वहां पर फंसे तिब्बत विद्रोहियों की मदद की , जिसका भारतीय दूतावास ने खंडन किया , बाद में यह एक चीनी भूमिका सिद्ध हुई , मैयितुं(migyitun) के दक्षिण में स्तिथ लोंगजू चौकी पर आक्रमण कर कब्ज़ा करने की। (वर्त्तमान में भी चीनी ही काबिज है इस पोस्ट पर )

25, 26 अगस्त की घटना ने चीनी नेतृत्व में यह समझ विकसित हुई ” जब भारतीय जमीन पर आगे बढ़ने के लिए तेवर दिखाए , तब उनकी सोच बदलने के लिए सैन्य करवाई की आज्ञा दे देनी चाहिए ” इसके अलावा, इसमें सैन्य जोखिम भी नाम मात्र का ही है , क्योंकि हम मजबूत पक्ष है।
यह एक तरह से राजनैतिक जोखिम था (चीन के खिलाफ सख्त भारतीय राय) , लेकिन इसकी कीमत उठाई जा सकती थी , क्यों की यह लम्बे समय तक चलने वाला नहीं था , फिर नेहरू जी , नेहरू जी थे , वह लड़ने की बजाये दूसरे रस्ते ढूंढ़ने में लगे रहते। इसलिए चीन का नुकसान कोई बड़ा नुकसान नहीं है और स्थाई भी नहीं है।

NEFA , आज का अरुणाचल प्रदेश जिस पर चीन अपना दावा पेश करता है

अगस्त के महीने में हुई इस घटना ने भारत के कमजोर सैन्य पक्ष को दर्शाया , लेकिन भारतीय सैन्य अफसर खुश थे की बात खुल कर सामने आयी जनता के , क्योंकि वह भी परेशान थे सीमा पर चीन की बढ़ती हुई ताकत से , क्यूंकि चीनी सेना की परिस्तिथि ज्यादा अनुकूल थी भारतीय सेना की अपेक्षा, वह संख्या में ज्यादा थे और उनके पास बेहतर संसाधन थे भारतियों के मुकाबले। भारतीय सैन्य खुफिया के निदेशक ने NEFA (आज का अरुणाचल प्रदेश ) से लगी रक्षा चौकियों को असम राइफल्स की जगह सेना के सुपुर्द करने की बात कही लेकिन इतनी ऊंचाइयों में लड़ने के अभ्यस्त लड़ाकों की कमी थी भारतीय फ़ौज में , जो मौजूद थे उन्हें कश्मीर में तैनात किया गया था।

विदेश सचिव दत्त ने संयुक्त राष्ट्र मिशन के उप प्रमुख ब्राउन को बताया की भारतीय प्रतिनिधि मंडल चीन के खिलाफ कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा। और आगे कहा “हम ,एक शक्तिशाली देश , जिसके साथ 2680 किलोमीटर की सीमा लगी हुई है , उसके साथ दोस्ताना सम्बन्ध चाहते हैं “।
इसी दौरान नेहरू जी ने राजनैतिक तौर पर दो कोशिशें की , पहली – उन्होंने रूस को उत्पन स्तिथि के बारें में अवगत कराया। दूसरा – उन्होंने बीजिंग में बातचीत कर सीमा मुद्दे को सुलझाने की बात कही। और इन दोनों बातों का कोई खास फयदा नहीं हुआ। ४ सितम्बर को संसद में बोले की राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए , उकसावे के बावजूद गुस्से में आकर हमने कोई कदम नहीं उठाया। नेहरू ने चीनी नेताओं से निहितार्थ अपील की और कहा की दोस्ती नहीं हो सकती ” कमजोर और ताकतवर में , धौंस देने वाले में और धौंस सहने वाले के बीच ” और आगे कहा की हम बातचीत करना चाहते हैं , लद्दाख और मक्मोहन रेखा के बारें में ।

1954 चीन की यात्रा के दौरान शंघाई में चीनी स्काउट्स के साथ खिंचायी गयी नेहरू जी की तस्वीर

इसके जवाब में चीन ने सबसे पहले यह बताना चाहा की भारत किसी भी तरीके से चीनी आक्रमकता का शिकार नहीं हुआ था , बल्कि आक्रमकता भारतीयों ने दिखाई और चीन हरेक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे को बातचीत से सुलझाने की कोशिश करता है।
अगला कदम चीन का यह था की पहली बार ऐसा हुआ की चीन ने निश्चित सीमा की स्थिति को लिख कर नेहरू जी सौंपा और इसी को मान जाने की अपेक्ष की। क्योंकि चीन अब तक समझ चूका था की नेहरू जी किसी भी हालत में युद्ध नहीं चाहते हैं , अब चीन अपनी बात मनवाने के लिए प्लान बनाने लगा।
8 सितम्बर , नेहरू जी के संसद में दिए गए भाषण एक दिन बाद चीन ने एक मसौदा तैयार किया , जो मार्च में नेहरू जी द्वारा भेजे गए खत का जवाब भी था। खत की शुरुआत में चीनी प्रधान मंत्री चाऊ एनलाई ने आश्चर्य व्यक्त किया नक्शों के मूलभूत अंतर का , इससे पहले हर समय बहुत छोटा सा अंतर कह कर जो टालते रहे थे। फिर उन्होंने यथास्तिथि को बनाये रखते हुए , बॉर्डर मामले का समग्र निपटारे की चरणबद्ध तैयारी पर जोर दिया। फिर उन्होंने अपनी पक्ष को लिखा , जो कुछ इस प्रकार है।
1, बीजिंग पूर्वी सीमा पर बनी मक्मोहन रेखा को नहीं मानता , यह गुप्त रूप से तिब्बती और ब्रिटिश अधिकारीयों द्वारा निर्मित कृत्रिम रेखा है , जिसे चीनी सरकार ने कभी मंजूरी नहीं दी।
2, चीन और उत्तरप्रदेश से लगती सीमा का कभी सीमांकन किया ही नहीं गया। (यह भारत भी जानता हैं )
3, और पश्चिमी इलाके में , हम लद्दाख से लगी सीमा को हम पुराने रेखांकित नक्शों से मानते हैं , यह परंपरागत प्रथागत रेखा हमारे कई सारे पुराने नक्शों में इंगित है।
4, भूटान और सिक्किम से लगी सीमा फिलहाल मुद्दा नहीं है चीन और भारत के बीच में , तो इसे अभी के लिए छोड़ा जा सकता है।

विवादित क्षेत्रों को दिखता भारतीय नक्शा

पत्र में यह भी कहा गया की बेशक हम मक्मोहन रेखा को नहीं मानते , फिर भी हमारे सैनिकों ने कभी उसे पर नहीं किया , हम अपने पडोसी देश भारत से अच्छे सम्बन्ध चाहते हैं , हम अपना हक़ NEFA (आज का अरुणाचल प्रदेश) में छोड़ने को तैयार हैं यदि भारत अक्साई चीन की दावेदारी को वापिस ले तो।
पत्र के शेष भाग में अगस्त में हुई घटना का आरोप अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों पर लगा दिया गया , कहा की मैयितुं में भारतीय सैनिको द्वारा गोलीबारी की गयी , और जवाबी करवाई के लिए उकसाया गया। सीमा में चल रहे विवाद को रोकने के लिए “सीमा की लंबी-मौजूदा स्थिति को बरक़रार रखा जाये” , और इसीको आत्मरक्षा की रेखा माना जाये। आने वाले सालों में इसी भाषा का प्रयोग कई बार किया गया।

नेहरू जी के 10 सितम्बर को संसद मैं दिए गए वक्तव्य से उनका चीन के प्रति मोहभंग होता दीखता है , नेहरू जी ने कहा” मुझे नहीं लगता हम दोनों देश एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं , “अहम्” मुद्दा बन गया है सीमा मामले में , और हम चीनी धौंस के आगे झुकने वाले नहीं हैं।
नेहरू जी ने 13 सितम्बर को इससे कड़े शब्दों का प्रयोग किया और कहा की चीनी सैन्य करवाई “अभिमान और अहंकार है शक्तिशाली देश का “।

21 अक्टूबर 1959 को दक्षिण लद्दाख स्तिथ कोंग्का पास के निकट , चीनी सैनिकों ने भारतीय पुलिस गस्ती दल के 9 लोगों की गोली मर कर हत्या कर दी , और 10 को पकड़ कर ले गए। भारतीय सूत्रों के मुताबिक 20 अक्टूबर २ पुलिस कर्मी और 1 कुली जो गस्ती पर गए थे लौट कर नहीं आये , 21 अक्टूबर को उन्हें ढूंढने निकली पुलिस टीम पर कोंग्का पास के निकट ऊंचाई से चीनी सैनिकों ने बम से और मोर्टार से हमले किये गए , जिसमें 9 भारतीय सैनिक हताहत हुए।

21 अक्टूबर 1959 को दक्षिण लद्दाख स्तिथ कोंग्का पास के निकट , चीनी सैनिकों ने भारतीय पुलिस गस्ती दल के 9 लोगों की गोली मर कर हत्या कर दी , और 10 को पकड़ कर ले गए।

5 और 6 अक्टूबर 1959 को चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ और चीनी विदेश मंत्री लीउ शो -ची ने भारतीय कम्युनिस्ट नेता घोष से बातचीत में कहा की उन्हें जल्दी ही सीमा मामले का निपटारा करना है और वह NEFA की अपनी दावेदारी छोड़ देंगे यदि भारत अक्साई चीन की अपनी दावेदारी को खत्म करें तो , और इस बात को मनवाने के लिए जरूरत पड़े तो दबाव भी डालेंगे। फिर माओ ने कहा की बातचीत शुरू करने से पहले उचित माहौल बनाना पड़ेगा। माहौल बनाने के लिए सबसे पहला कदम था , चीनी निमंत्रण भारतीय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन का 5 दिवसीय चीन यात्रा का , जब यह बात नेहरू जी को पता लगी की चीन सीमा की बात करने की पहल के तौर पर भारतीय उपराष्ट्रपति को निमंत्रित करना चाह रहे है , तब वह इस बात से खुश थे , लेकिन जब 24 अक्टूबर 1959 को औपचारिक निमंत्रण आया , तब नेहरू जी और उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने इसे ख़ारिज कर दिया , 21 अक्टूबर की घटना की प्रतिक्रिया के रूप में ।

25 अक्टूबर को जब नेहरू जी ने लोगों के सामने अपनी प्रतिक्रिया रखी , तब वह बात को इधर उधर घुमाने की कोशिश कर कर थे , और उन लोगों को चेता रहे थे जो ” वीर वाद ” कर सैन्य करवाई करने की बात कर रहे थे। लेकिन प्रेस और कुछ सांसद आड़े रहे वापिसी सैन्य करवाई के लिए , कुछ अख़बारों ने लेख छापे की नेहरू जी को गैर कम्युनिस्ट देशों से सहायता लेनी चाहिए जिससे नेहरू जी ने एक सिरे से ख़ारिज कर दिया और कहा हम अपनी गुटनिरपेक्ष नीत्ति में परिवर्तन नहीं कर सकते है , और यह वह वजह है जिससे हम सर उठा कर चल रहे हैं आज , फिर नेहरू जी कहा की हम किसी भी तरह अपनी सीमा की रक्षा करेंगे , लेकिन यह नहीं बताया की कैसे। लद्दाख पर और सेना की तैनातगी वाली बात पर नेहरू जी ने कहा की यदि हम बड़ी संख्या में फ़ौज को लद्दाख में रखतें हैं तो यह देश के दूसरे हिस्सों से कट जायेगा और इमरजेंसी के समय में फ़ौज को एक जगह से दूसरी जगह में ले जाने में बहुत वक़्त लगेगा।

यह बात जो नेहरूजी ने फ़ौज की तैनातगी के बारें में कही इसबात को सेना की राय न माने , जनरल थिमैया ने गवर्नर्स सम्मेलन में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को और वित्तमंत्री देसाई को बताया की , उन्होंने अक्साई चीन की कब्जे की खबर के बाद प्रस्ताव दिया सैन्य अभियान का , अक्साई चीन को चीनी कब्जे से मुक्त करने के लिए जिसे तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्णा मेनोन ने यह केह कर खारिज कर दिया की असली खतरा पाकिस्तान से है न की चीन से।

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पंडित जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनोन

नेहरू जी और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनोन दोनों ही पाकिस्तान को चीन से बड़ा दुश्मन मानते थे , इस वजह से सबसे बड़ी परेशानी जो बनी रही उस समय सेना के साथ , की कितनी सेना को पश्चिमी पाकिस्तान से लगे हुए क्षेत्र से हटा कर NEFA या लद्दाख से लगी सीमा पर तैनात किया जा सकता था , बैगैर पश्चिमी सीमा को कमजोर किये हुए।
1959 खत्म होते होते भारत के पास दो विकल्प थे ।

1, चीन द्वारा कब्ज़ा की गयी अक्साई चीन की जमीन को सैन्य करवाई द्वारा वापिस हासिल किया जाये।

2 , यह मान लिया जाये की जो गया सो गया , बाकि पर फ़ौज की तैनातगी कर सुरक्षित किया जाये। भारत ने दूसरा विकल्प चुना।

इस निर्णय के पूर्णरूप से जिम्मेदार नेहरू जी थे , चीनी कब्जे को लेकर भारतीय राय बदलने के लिए नेहरू जी ने कहना शुरू कर दिया , की कब्ज़ा की गयी जमीन पूर्ण रूप से बंजर है , जिसका बहुत कम महत्व है – निर्जन, चट्टानी, घास का एक तिनका भी नहीं उगता।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने इस बात पर कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त की और कहा की , नेहरू जी अक्साई चीन को बेचने की तरफ बढ़ रहे हैं।

नेहरू जी की इस बात को और बल मिला जब जनरल थिमैया ने यह कहा की अक्साई चीन के मैदान पर कब्ज़ा तो किया जा सकता है पर रक्षात्मक पंक्ति का निर्माण करना फिलहाल संभव नहीं है , इसकलिये काराकोरम पहाड़ियां ज्यादा उपयुक्त जगह है।

जनरल थिमैया, नेहरू जी और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनोन

लेकिन अन्य भारतीय अधिकारी चीन के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया के पक्ष में थे , जब नेहरू जी को चीनी दूतावास ने खबर भेजी की उनकी सेना सिर्फ उनके अपने क्षेत्र पर काबिज हैं , और बातचीत शुरू होने और खत्म तक यथास्तिथि बनाये रखेगी , तब जब नेहरू जी ने जवाबी पत्र लिखा , और उस पत्र को जब राष्ट्रपति ने देखा तब वह नाराज़ हुए नेहरू जी से और कहा की पत्र में दृढ़ता नहीं है , इसके बाद ही 4 नवंबर 1959 में नेहरू जी अपने पत्र में कड़े शब्दों का प्रयोग किया। इसी दिन हज़ारों की संख्या में छात्रों ने चीनी दूतावास के सामने प्रदर्शन किये , और प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचकर और सैनिक करवाई करने की मांग करते हुए ज्ञापन दिया।
इस पत्र में नेहरू जी जो भूमिका तैयार कर रहे थे अक्साई चीन के बारें में उसको दूर रखा गया। और चीन को आगाह किया गया की मक्मोहन रेखा के दक्षिण में चीनी सैनिकों का देखा जाना एक जानबूझकर किया गया उल्लंघन माना जायेगा।

इस समय नेहरू जी के आलावा यदि कोई और फौजी दिमाग वाला प्रधानमंत्री होता तो दो बार के सीमा सुरक्षा बालों के हताहत होने की घटना के बाद सैन्य तैयारियां तेज करवा देते, और कमजोर होने के बावजूद धीरे धीरे अपनी ताकत में इजाफा कर बदला लेने की सोचता । सिर्फ दो महीने के अंदर २ बार सैन्य पराजय का मुँह देखने के बाद भी के बावजूद नेहरू जी सेना को तैयार करने को राज़ी नहीं थे। एक बार इसी अक्टूबर में कैबिनेट स्तर की मीटिंग में नेहरू जी ने कहा की , बॉर्डर पर होने वाली लड़ाइयां देश के लिए खतरा नहीं है।

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