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विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 1

Prime Minister of India Jawaharlal Nehru (left) and the Dalai Lama (center) with the Mahout (right) during a trip around India’s Presidential palace in New Delhi. The interesting joy-ride followed a lunch given in honour of the Dalai Lama by the then Indian President Dr. Rajendra Prasad (1952-1962). Photo taken on Dec. 12, 1956

चीनी प्रधान मंत्री “झोउ एनलाई” ने 1954 से ही अपने रवैये से नेहरू जी को यकीन दिला रखा था की कोई सीमा विवाद नहीं है , और छोटा मोटा विवाद है भी तो उसे निचले स्तर पर बात कर के सुलझा लिया जायेगा , लेकिन जब 14 दिसंबर 1958 में जब नेहरू जी ने दबाव डालकर पूछा तब , चीनी प्रधान मंत्री ने अपने 23 जनवरी 1959 के खत में कहा की “हालिया हुए घटनाक्रम से पता चला है की सीमा विवाद है , भारत और चीन के बीच में “।
नेहरू जी को 1958 खत्म होते होते यकीन हो गया था की मामला गंभीर है , 1954 में चीनी प्रधान मंत्री ने सीमा पर बोलते हुए कहा “अभी स्थितियां उतनी नहीं बनी की इसके निपटारे के लिए कदम उठाये जाएँ “, ने आश्वस्त कर रखा था नेहरू जी को।

1954 जवाहरलाल नेहरू बीजिंग में चाउ एन-लाई और मैडम सन यात-सेन के साथ

1958 के नेहरू जी के दबाव डालने के बाद चीनी प्रधान मंत्री का जवाब आया ” 1, पुराने सभी चीनी नक़्शे बहुत हद तक सही हैं। 2, अब उन में कोई भी परिवर्तन करना संभव नहीं होगा। 3, भारत द्वारा दर्शाये गए , अक्साई चीन को लेकर चीनी लोगों में विरोध है , और वह चीन का हिस्सा है।
आगे लिखा की ” हमारे लोगों ने भी आश्चर्य व्यक्त किया है जिस तरह से चीन-भारतीय सीमा को भारतीय नक़्शे में दिखाया गया है , लोगों ने इस बात को भारतीय सरकार के समक्ष रखने को कहा है , फिर भी हम ने यह मुद्दा नहीं उठाया और सीमा की यथोचित स्तिथि के बारें में लोगों को अवगत कराया “
चीनी नेतृत्व को लगा की नेहरू जी कामयाब हो जायेंगे सीमा की यथोचित स्तिथि को भारतीय लोगों और संसद को समझने में , जब ऐसा हुआ नहीं तब चीनी दृष्टिकोण नेहरू जी के प्रति बदल गया , अब उनकी तटस्थ विदेश नीति वाली स्तिथि खत्म हो चुकी थी और अब उन्हें चीन विरोधी समझा जाने लगा। जब चीनी नेतृत्व को यह लगा की अब इस मुद्दे को अधिक समय तक ठंडे बास्ते में नहीं डाला जा सकता तब चीनी नेतृत्व ने अपना दावा पेश कर दिया अक्साई चीन और NEFA (आज का अरुणाचल प्रदेश ) की जमीन को लेकर।

लाल रंग में दिखाया गया अरुणाचल प्रदेश का एरिया जिसे NEFA कहा जाता था

फिर भी , चीनी नेतृत्व भारत से युद्ध नहीं चाहता था उस दौरान , चीनी प्रधानमंत्री ने कहा ” हमारी सरकार भारतीय सरकार को यह प्रस्ताव देना चाहती है की , अभी फिलहाल यथास्तिथि बनाये रखते है , जो जहाँ है वहां पर वाली। ” इसका मतलब यह था की चीन को और समय मिल जाता अपनी स्तिथि को अक्साई चीन में और मजबूत करने के लिए। चीन को इस बात से नेहरू जी की कठोर प्रतिक्रिया की उम्मीद थी , जो निकल कर भी आयी 22 मार्च 1959 को तिब्बत विद्रोह के बाद , नेहरू जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा की यह सीमा विवाद भारत चीन रिश्तों में खटास लाएगा।
दिसंबर 1958 से मार्च 1959 तक खतों के आदान प्रदान होते रहे नेहरू जी और चीनी प्रधान मंत्री के बीच , जो दूरियां बढ़ाते गए चीनी और भारतीय रिश्तों में , 10 मार्च 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद यह स्तिथि बहुत ही चिंताजनक हो गयी , इसी बीच भारतीय राजनयिकों ने पश्चिमी दुनिया को सन्देश दे दिया था चीन और भारत के बिगड़ते रिश्तों के बारें में । चीन की तिब्बत में उग्र सैन्य करवाई और उससे उपजे विद्रोह के बारें में भारतीय संसद और जनता अनिभिज्ञ नहीं थी , फिर यह सीमा विवाद जिसने आग में घी का काम किया।
नेहरू जी अब भी आशावादी थे चीन से अपने रिश्ते को लेके , फरवरी के मध्य में , भारतीय लेखक चंद्रशेखर ने तिब्बत पर लिखे एक लेख में कहा , “इंसानों से चिडयाघर में रहने वाले जानवरों की तरह व्यवहार किया जा रहा ” , इस पर जब चीन से तीखी प्रतिक्रिया आयी , तब नेहरू जी ने स्वयं चंद्रशेखर को डांटा , जबकि वह भी इस सचाई से वाकिफ थे।


नेहरू जी को मार्च के अंत तक यह समझ में आ चूका था की अब उन्हें साम्यवादी चीन के साथ संबंधों पर पुनर्विचार करने का समय आ चूका है।
17 मार्च 1959 को दलाई लामा ल्हासा छोड़ चुके थे , और उन्होंने भारत में शरण मांगी , उनके साथ विद्रोहियों का हथियार बंद जथा भी था , नेहरू जी को संशय था की इनका पीछा करते करते कहीं चीन सेना भारत में न घुस जाएँ, इसलिए पहले अग्रिम चौकियों को निर्देश दिए गए की किसी भी तिब्बती विद्रोही को सीमा के इस पर आने न दिया जाये , बाद में इस निर्णय को बदल दिया गया और विद्रोहियों को भारत प्रवेश की अनुमति दे दी गयी , साथ में ही गुप्त सूचना दे दी गयी दलाई लामा को शरण देने की। 31 मार्च 1959 में दलाई लामा तवांग पहुँच चुके थे अपने सेवको के साथ , इस दौरान दलाई लामा को प्रेस और राजनैतिक गतिविधियों से दूर रखा गया , और रहने के लिए कहा गया , क्योंकि भारतीय नेतृत्व अब भी चीन की उग्र प्रतिक्रिया से बचना चाह रहा था।

भारतीय नेतृत्व और चीनी नेतृत्व ने अपने अपने लोगों के आक्षेप के बाद भी चुपी बनायीं रखी इस दौरान।

18 अप्रैल 1951 को चीनी प्रधानमंत्री ने नेहरू जी की निजी नीत्ति , तिब्बती मामले हस्तक्षेप न करने की प्रशंसा की, उसी दिन तिब्बत नेता दलाई लामा ने अपने एक वक्तव्य में तेज़पुर में चीनी दावों को एक सिरे से खारीज करते हुए बोले ” की वह किसी दबाव में नहीं है , और चीन ने तिब्बत- चीन के स्वराज समझौते का उलंघन किया है , और तिब्बत को आज़ादी चाहिए।” इस वक्तव्य को विदेश मंत्रालय ने बड़ी अनिच्छा से जारी करने की अनुमति दी थी , चीन ने इस बात पर बहुत नाराज़गी व्यक्त की , अब चीनी नेतृत्व को लगने लगा था की नेहरू जी दोहरा खेल खेल रहे है ।
इसी बीच चीन के सरकारी अख़बार पीपल डेली में सम्बंधित लेख छापा जिसमें लिखा गया की ” भारत के कुछ प्रभावशाली नेता , चीन को कमजोर मानते हैं और यह समझते हैं की यह सही समय है दबाव डालने का ” , फिर लेख आगे कहता है की ” सबसे बड़ी त्रासदी किसी भी राजनेता की स्तिथि का गलत निर्धारण होती है। “

२० अप्रैल 1959 को मसूरी पहुंचे दलाई लामा की तस्वीर

अप्रैल 1959 आते आते चीन और भारत के रिश्तों में खटास आ चुकी , अन्य देश सोच रहे थे की भारत चीन के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत का क्या हुआ , इस समय चीनी नेतृत्व की प्राथमिकता तिब्बत में उपजे विद्रोह को खत्म करने एवं नेहरू जी को स्पष्ट सन्देश देने की थी, चीन ने बड़ी सैन्य करवाई कर विद्रोह को कुचल दिया , और चीन ने साफ़ शब्दों में चीन के आतंरिक मामले में , भारतीय हस्तक्षेप की निंदा की।

नेहरू जी के 27 अप्रैल 1959 में संसद में दिए गए भाषण को चीन ने , चीन विरोधी माना गया , और उस पुरे भाषण को 30 अप्रैल 1959 में चीन ने छापा अपनी सरकारी अखबार में और चीनी लोगों के सामने प्रस्तुत किया। इस भाषण में चीनी सरकार और जनता को , नेहरू जी की दलाई लामा और उन भारतीय राजनीतिक हस्तियां जो तिब्बत की पूर्ण आज़ादी की बात कर रहे थे , के प्रति सहानुभूति देता दिखा ।
29 अप्रैल 1959 को पंचेन लामा (दलाई लामा के बाद का दूसरा सर्वोच्च पद, तिब्बती संस्कृति में। दलाई लामा के भारत आने के बाद यह कुछ समय तक तिब्बती मामलों का अध्यक्ष रहे ) ने बीजिंग में कहा की नेहरू के बयान ,”भारत का तिब्बत में कोई राजनैतिक लक्ष्य नहीं है”, की कथनी और करनी में फरक है ।

1935 की नेहरू जी की आत्मकथा में एक कथन है कि ‘वर्ग और समूह … शासी और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग ” को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है

6 मई 1959 में चीन के सरकारी अख़बार में एक लेख छपा “तिब्बती क्रांति और नेहरू दर्शन ” यह बहुत चतुरता से लिखा हुआ लेख था , इसमें नेहरू के दर्शनशास्त्र का उल्लेख कर चीन ने अपने तिब्बती कब्जे को जायज ठहराया। 1935 की नेहरू जी की आत्मकथा में एक कथन है कि ‘वर्ग और समूह … शासी और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग ” को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है और न ही राजनीतिक सत्ता को त्यागने के लिए राजी किया जा सकता है , इस कथन का उल्लेख करते हुए चीनी अख़बार ने कहा की जब हमने यही कोशिश की तिब्बत में तो नेहरू जी हमारी खिलाफत कर रहे है , नेहरू जी अपने कथन अनुसार समाजवादी हैं ही नहीं।

नेहरू जी अप्रत्यक्ष रूप से तुलना नए भारतीय पूंजीवादियों से की जो एक तरफ अपने आपको साम्राज्यवादी ताकतें की खिलाफ बताते है और दूसरी तरफ अपना साम्राज्य बनाने में लगे हुए थे।

नेहरू जी ने गुट निरपेक्ष आंदोलन अपनी तटस्थ नेता की छवि बनाने के लिए की ,1959 में चीनियों ने नेहरू जी को तटस्थ नेता मानना बंद कर दिया। चीनियों की परिभाषा में तटस्थ नेता वह है जो हर चीनी नीत्ति का समर्थक हो , या फिर समर्थक नहीं है तो कम से कम विरोधी न हो। चीनी सरकार का शक नेहरू जी को लेकर गहराता गया इस दौरान , उन्हें पश्चिमी खेमें की तरफ झुकता हुआ मान रही थी चीनी सरकार।

22 अप्रैल 1959 को संसद में पूछे हुआ सवाल का की “क्या कोई सीमा विवाद हैं चीन के साथ ?” पर नेहरू जी ने सचाई को छुपाया और कहा की सीमा विवाद तो है मगर बहुत छोटा 2,4 किलोमीटर का और जल्दी ही सुलझा लिया जायेगा।

इसी बीच चीन के प्रधानमंत्री ने नेहरू जी से सीधे बात करनी बंद कर दी। जून 20 में दलाई लामा ने प्रेस वार्ता में ” तिब्बत की आज़ादी की मांग की ” , जिसका चीन ने यह कह कर विरोध जताया की , भारत दलाई लामा पर दबाव नहीं बना पा रहा। इस बात का आगे न बढ़ने देने के लिए , जून 30 को जब तिब्बती नेताओं ने दलाई लामा को संयुक्त राष्ट्र को सोपें जाने की बात कही , तब भारतीय अधिकारियों ने इस बात का विरोध किया।


परम पावन दलाई लामा 1959 के दिसंबर में आगरा, यूपी, भारत में ताजमहल देखने आए।

तिब्बती विद्रोह को कुचलने के बहाने चीन ने भारत चीन सीमा पर भारी सैन्य तैनातगी कर दी, जिससे भारत आने वाले तिब्बतियों की संख्या बिलकुल कम हो गयी। इसी बीच यह खबर आयी की भारतीय सीमा से लगे , चीनी क्षेत्र में कच्चे रास्तों को पक्का बनाने का काम किया जा रहा है। गर्मी के आखरी महीने तक चीनी सेना की तैनातगी सीमा पर भारत की तैनातगी से हर क्षेत्र में बेहतर हो गयी थी। चीनी सेना अक्सर तिब्बतियों को खोजते हुए भारतीय क्षेत्र में घुस आती थी , और फिर चली भी जाती थी , क्योंकि यह कोई बड़ी घटना नहीं थी इसलिए भारतीय विदेश मंत्रालय ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।

सबसे पहली बड़ी घटना का जिक्र बीजिंग के 23 जून के लेख में मिलता है , जिसके अनुसार २०० भारतीय सैनिकों ने चीन के मैयितुं क्षेत्र में प्रवेश कर गोली बारी की वहां फसें तिब्बतियों को बहार निकल , भारत लाने के लिए। लेकिन भारत ने 26 जून को इस बात का खंडन किया। चीनी यह मानने लग गए थे की भारतीय सेना तिब्बतियों की मदद कर रही है।

पश्चिमी इलाके पर , 28 जुलाई को 6 भारतीय सीमा पुलिस के जवानो को 25 चीनी सैनिकों ने पकड़ लिया पैंगोंग झील के समीप और 18 अगस्त तक अपनी हिरासत में रखा। इसी दौरान , 7 अगस्त को 200 चीनी सैनिको ने भारतीय क्षेत्र ख़िन्ज़ीमाने में प्रवेश किया और वहां तैनात भारतीय सैनिकों को पीछे दखेला ।

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 1

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 2

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संक्षेप में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं

विस्तार में – CIA रिपोर्ट 1962 के भारत – चीन युद्ध पर – 1950 से 1959 के घटनाक्रम जिसने युद्ध की भूमिका बनायीं -पार्ट 2