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1962 का भारत चीन युद्ध का मुख्य कारण

Indian officers occupying a fort on the Ladakh border during the war between India and China, 1962. (Photo by © Hulton-Deutsch Collection/CORBIS/Corbis via Getty Images)

१९६२ का भारत चीन युद्ध का मुख्य कारण सीमा विवाद था , यह दो क्षेत्रों में था।

1) अक्साई चिन , जो जम्मू और कश्मीर के लद्दाख जिले के उत्तरपूर्व में स्थित है।
2) नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA), जो अरुणाचल प्रदेश है वर्तमान समय में ।

आज़ादी से पहले , ब्रिटिश इंडिया काल में सीमा निर्धारण के लिए अलग अलग समय पर अलग अलग कमैटी ने सर्वे कर अलग अलग सीमाओं का प्रस्ताव रखा , यह उस समय के सामरिक महत्व के हिसाब से, और चीन ने सभी नक्शों को अपनी सहूलियत के हिसाब से कुछ कुछ समय बाद खारिज कर दिया , यहीं से विवाद और फिर युद्ध की शुरुआत हुई।

Hogweard / Public domain यह नक्शा अक्साई चिन क्षेत्र में सीमा के भारतीय और चीनी दावों को दिखा रही है , १८६५ की जॉनसन लाइन, मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड लाइन, विदेश कार्यालय लाइन, साथ ही चीनी सेना द्वारा कबजाइ जगह दिखा रही है

1) अक्साई चिन समस्या

1865 में सर्वे ऑफ़ इंडिया के विलियम जॉनसन ने एक प्रस्ताव रखा; “जॉनसन लाइन्स” , जिसमें अक्साई चिन( जिस पर चीन का कब्ज़ा है अभी और कश्मीर के उत्तर पश्चिम में स्तिथ है ) को कश्मीर का हिस्सा बताया गया , उस समय पर चीन का आज के शिनजियांग क्षेत्र (तिब्बत के उत्तर में ) पर कब्ज़ा नहीं था , तो इस नक़्शे को चीन को नहीं दिखया गया।

जब यह नक्शा कश्मीर के महाराजा को दिखाया गया , तब उन्होंने इससे आगे भी अपना अधिकार क्षेत्र बताया, शहीदुल्ला और खोतान तक (जो आज के शिनजियांग क्षेत्र के दक्षिण पश्चिम में आता है ) शहीदुल्ला में तो एक छोटे से किले का भी निर्माण कराया था कश्मीर के महाराजा ने ।


जम्मू और कश्मीर की पारंपरिक सीमाएँ (CIA नक्शा)। उत्तरी सीमा काराकाश घाटी के साथ है। अक्साई चिन पूर्व में छायांकित क्षेत्र है।

1878 में चीन ने दुबारा शिनजियांग क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया , और शहीदुल्ला का विलय शिनजियांग में हो गया , 1892 में चीन ने सीमा चिन्ह काराकोरम दर्रे , के निकट लगवाए। और 1893 में चीनी अधिकारीयों ने अँगरेज़ ऑफिसर्स को अपने नक्शे दिए और अपना विरोध व्यक्त किया जॉनसन लाइन के प्रति ।

1897 में ब्रिटिश सैन्य अधिकारी, सर जॉन अर्दघ, ने एक नयी सीमा रेखा प्रस्तावित की जिसमें विलियम जॉनसन के नक़्शे के कुछ एक घटकों को शामिल किया गया और इसे “अर्दघ-जॉनसन लाइन “. कहते है।

इसके बाद 1899 में एक और कमैटी बनाई गयी, नयी सीमायें खिंची गयी “मैकार्टनी -मैक्डोनाल्ड लाइन “, यह सीमा जॉनसन द्वारा बनाइ गए सीमा से कुछ पीछे हटकर बनायीं गयी थी , और इसे नक़्शे को अंग्रेज ऑफिसर्स ने चीन अधिकारियों को दिया गया , लेकिन चीन से नक़्शे के प्रति कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की , तो इससे सर्वमान्य मान लिया गया।

By Edinburgh Geographical Institute; J. G. Bartholomew and Sons. – Oxford University Press, 1909. Scanned and reduced from personal copy byFowler&fowler«Talk» 18:10, 5 August 2007 (UTC), Public Domain, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=7381045

1908 तक ब्रिटिश राज ने 1899 में खिंची गयी “मैकार्टनी -मैक्डोनाल्ड लाइन ” को ही सीमा माना , फिर 1911 आते आते चीन , आतंरिक कलेशों की वजह से बहुत कमजोर हो गया था , तो ब्रिटिश सरकार ने दुबारा से 1865 में प्रस्तावित जॉनसन लाइन को ही सीमा मानना शुरू कर दिया। लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अधिकार सिद्ध करने के लिए , ब्रिटिश राज ने कोई रक्षा चौकी की स्थापना नहीं की। 1927 में फिर एक बार ब्रिटिश राज ने फिर से जॉनसन लाइन से पीछे हटकर नक़्शे में फेरबदल किये , लेकिन आधिकारिक पुष्टि नहीं की सीमा की।
इसी बीच चीन सरकार की पोस्टल सर्विस ने जो नक्शा छापा(1917 से 1933) उसमें जॉनसन लाइन के हिसाब से चीन के बॉर्डर को माना गया।

जब 1940 -41 में रूसी , अक्साई चिन में सर्वे कर रहे थे , शिनजियांग के शाषक के लिए , तब ब्रिटिश राज ने दुबारा जॉनसन लाइन की वकालत की , लेकिन अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए कोई उपाय नहीं किये , और न ही अपनी चौकियां बनायीं और न ही इस मसले को सुलझाने के लिए कोई बातचीत की गयी तिब्बत या चीन के साथ, यथावत स्थिति बनी रही हिंदुस्तान की आज़ादी तक।

आजादी के समय 1947 में अक्साई चिन भारत का हिस्सा था। 1947 में आजादी मिलने के बाद, भारत सरकार ने पश्चिम में अपनी आधिकारिक सीमा तय की, जिसमें अक्साई चिन शामिल था, जो अर्दघ-जॉनसन लाइन से मिलता-जुलता था, लेकिन चीन की सरकार कभी नहीं मानेगी। सीमा को परिभाषित करने के लिए भारत का आधार था “ऐतिहासिक जुड़ाव , प्रथा और लम्बा उपयोग”। 1954 में नेहरू जी ने मानचित्रों को संशोधित कर निश्चित सीमा निश्चित की कागजों में , लेकिन नेहरू जी ने ब्रिटिश राज का ही अनुसरण किया इस विषय पर , न ही चौकी बनायीं और न बातचीत की चीन के साथ।

अक्साई चिन में इंसानी आबादी नहीं थी , यह चीन के लिए इसलिए उपयोगी था क्योंकि यही से पुरे साल तिब्बत और शिनजियांग को जोड़े रखना वाला रास्ता गुजरता था।

1950 के दशक में चीन ने पश्चिमी तिब्बत और शिनजियांग को जोड़ने वाली 1200 किलोमीटर लम्बी सड़क बनवाई , जिसका 178 किलोमीटर का हिस्सा जॉनसन लाइन के अंदर, अक्साई चिन से होकर गुजर रहा था , इस सड़क के बारें को नेहरू सरकार को 1958 में पता चला , यही से शुरुआत हुई भारत और चीन के बीच के मतभेदों की , जो बाद में युद्ध में तब्दील हो गयी।

Central Intelligence Agency / Public domain

2) नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA), आज का अरुणाचल प्रदेश समस्या

मक्मोहन लाइन भारत और तिब्बत की सीमांकन रेखा है , जो वर्त्तमान समय में उत्तर पूर्व में स्थित अरुणाचल प्रदेश की सीमा निर्धारित करती है भूटान , चीन और बर्मा के साथ , इस बॉर्डर का प्रस्ताव 1914 शिमला सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार ने तिब्बती अधिकारियों को दिया और उसे मान भी लिया गया , लेकिन चीन ने इसका विरोध किया यह कह कर की” तिब्बतियों को यह निर्णय लेना का अधिकार नहीं है की कौन सी आधिकारिक सीमा है” , बाद में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया और आज यही वास्तविक नियंत्रण रेखा है भारत और चीन के बीच , लेकिन आधिकारिक तौर पर कभी भी चीन ने इसे स्वीकार नहीं किया।

1951 में असम राइफल्स की एक टुकड़ी की तैनातगी के साथ ही नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी पर भारत ने अपना आधिपत्य स्थापित कर दिया , यह इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तवांग और लोहित जो नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी के अंतर्गत थे पर अप्रत्यक्ष रूप तिब्बत से ही नियंत्रित हो रहे थे

By Central Intelligence Agency, Washington, 2002 – This map is available from the United States Library of Congress’s Geography & Map Division under the digital ID g7653j.ct000803.This tag does not indicate the copyright status of the attached work. A normal copyright tag is still required. See Commons:Licensing for more information., Public Domain, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=619055
भारत के विवादित क्षेत्रों को दिखाने वाला मानचित्र

यही दो सीमा विवाद थे भारत और चीन के बीच , लेकिन जब 1958 में नेहरू जी को यह पता लगा की चीन ने अक्साई चिन में सड़क का निर्माण कर लिया है तो सीमा विवाद को सुलझाने के लिए नेहरू जी ने चीन के समक्ष “पहले पीछे हटो, फिर बात करेंगे वाली शर्त रखी ” , चीन के चेयरमैन माओ की रणनीत्ति “एकता भी , लड़ाई भी” , वाली विचारधारा भी काम कर रही थी , चीन की तरफ से कई बार बातचीत की कोशिशें हुई , लेकिन नेहरू जी आपने बात पर कायम रहे। यही से नेहरू जी ने “फॉरवर्ड पालिसी” की शुरुआत की जनरल क़ौल के सुझाव पर , इसके अंतरगत बॉर्डर पर आर्म्ड पोस्ट बनाये गए , जहाँ पर छूटपुट घटनओं से शुरुआत हुई , फिर बाद में यह पूर्ण युद्ध में तब्दील हो गया 1962 की , जिसमें भारतीय नेतृत्व की कमी ने भारत को शिकस्ता दिलवाई।

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