in ,

करवाचौथ व्रत- चार कथा

करवा चौथ हिन्दू सुहागन स्त्रियों का एक प्रमुख त्यौहार है । यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को
मनाया जाता है , इस त्यौहार को राजस्थान , पंजाब , उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश और हरियाणा में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है , इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति के लम्बे आयु के लिए निरजला व्रत रखती है , यह व्रत सुबह सूर्य उदय से पहले शुरू होकर रात चंद्र दिखने तक चलता है।

संध्या पूजा का शुभ मुहूर्त 4 नवंबर 2020 (बुधवार)- शाम 05 बजकर 34 मिनट से शाम 06 बजकर 52 मिनट तक।

इस दिन भालचंद्र गणेश जी की पूजा के साथ व्रत का उद्यापन किया जाता है , भालचंद्र गणेश जी का मतलब है , गणेश जी का वह स्वरुप , मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है। कथा अनुसार , जब चन्द्रमा ने भगवान श्री गणेश का उपहास किया , तब भगवान श्री गणेश ने श्राप दिया चन्द्रमा को , की वो किसी को नज़र ही नहीं आएंगे , इस बात से विचलित होकर सभी देवगणो ने प्रार्थना की और अनुरोध किया भगवान श्री गणेश से की इस श्राप को कम कर दिया जाये , जिसके परिणाम स्वरुप श्री गणेश जी ने कहा की – केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को तुम अदर्शनीय रहोगे, जबकि प्रत्येक मास की कृष्णपक्ष चतुर्थी को तुम्हारा मेरे साथ पूजन होगा। तुम मेरे मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित रहोगे। इस प्रकार भगवान श्री गणेश , मस्तक पर चंद्रमा को धारण कर, भालचंद्र श्री गणेश बन गए।

इस व्रत का १२ से १६ साल तक लगातार रखने के पश्चात उद्यापन किया जा सकता है , या फिर चाहो तो जीवन भर भी रखा जा सकता है , यह बहुत ही सौभाग्य दायक व्रत माना जाता है।

करवा चौथ व्रत की कथा

एक अमीर साहूकार के एक लड़की और सात लड़के थे । एक बार शादी के बाद बेटी जब अपने मायके आयी कार्तिक मास में , तब कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को, साहूकार की सातों बहुएं, उसकी बेटी और उसकी पत्नी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा। रात्रि के समय जब साहूकार के सातों लड़के भोजन करने बैठे तो, उन्होंने अपनी बहन से भोजन कर लेने को कहा। इस बात पर बहन ने कहा- भाई, अभी तो चांद नहीं निकला है। चांद के निकलने पर ही , उसे अर्घ्य देकर ही , मैं आज अपना भोजन करूंगी।

साहूकार के बेटे, अपनी छोटी बहन से अत्यधिक प्रेम करते थे, उन्हें अपनी बहन को भूखा नहीं देख पा रहे थे। साहूकार के घर के बाहर गए और वहां एक पेड़ पर चढ़ कर आग का गोला बना कर , घर वापस आकर , अपनी बहन से कहा- देखो बहन, चन्द्रमा निकल आया है। अब तुम उन्हें अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण कर सकती हो । यह सुन साहूकार की बेटी ने , अपनी भाभियों से कहा की – देखो भाभी , चांद निकल आया है, आप लोग भी अर्घ्य देकर , भोजन कर ले ।
ननद की भोली बात सुनकर, सभी भाभियों ने कहा- बहन अभी चन्द्रमा नहीं निकला है, तुम्हारे भाई धोखे से आग जलाकर उसके प्रकाश को चन्द्रमा के रूप में तुम्हें दिखा रहे हैं।साहूकार की बेटी अपनी भाभियों की एक बात न सुनी और भाइयों द्वारा दिखाए गए नकली चन्द्रमा को अर्घ्य देकर , भोजन कर लिया।

इस तरह करवा चौथ का व्रत विधि विधान ने अनुरूप पूरा ना होने के कारण विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश ने साहूकार की लड़की से अप्रसन्न हो गए। तभी उस लड़की का पति बीमार पड़ गया और घर में बचा हुआ अधिकतर धन उसकी बीमारी में लग गया। साहूकार की प्रिय बेटी को जब अपने किए हुए , दोषों का पता लगा, तो उसे बहुत ही पश्चाताप हुआ। उसने गणेश जी, से क्षमा प्रार्थना की और फिर से विधि-विधान पूर्वक चतुर्थी का व्रत शुरू कर दिया। इस प्रकार साहूकार की बेटी के श्रद्धा-भक्ति को देखकर भगवान श्री गणेश जी उसपर प्रसन्न हो गए और उसके पति को जीवनदान दियाऔर उसे सभी प्रकार के रोगों से मुक्त करके धन, संपत्ति और वैभव से , पूरी तरह युक्त कर दिया।कहते हैं इस प्रकार से यदि कोई, मनुष्य छल-कपट, अहंकार, लोभ, लालच को त्याग कर श्रद्धा और भक्तिभाव पूर्वक चतुर्थी का व्रत को पूर्ण करता है, तो वह जीवन के सभी प्रकार के दुखों और क्लेशों से मुक्त होता है और फिर एक सुखमय जीवन जीता है।

करवा चौथ व्रत की कथा – द्वितीय

द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव-पार्वती कथा:

एक बार की बात है पराक्रमी अर्जुन नीलगिरि पर्वत पर तपस्या करने गए। अर्जुन की पत्नी द्रौपदी ने सोचा कि यहाँ हर समय कोई ना कोई समस्या रहती हैं। इन समस्या को सुलझाने के लिए अर्जुन तो यहाँ हैं नहीं, अत: कोई उपाय करना चाहिए। यह सोचकर उन्होंने, भगवान श्री कृष्ण का ध्यान किया।

भगवान वहाँ प्रकट हुए , द्रौपदी ने अपने समस्यों को सुलझाने हेतु कोई उपाय बताने को कहा। इस बात पर श्रीकृष्ण बोले ki- एक बार माँ पार्वती जी ने भी भगवान शिव जी से यही प्रश्न किया था तब भगवान शिव ने माँ पार्वती को बताया की कि करवाचौथ का व्रत गृहस्थी में आने वाली छोटी- मोटी विघ्न-बाधाओं को दूर करने वाला है, यह पितृ प्रकोप को भी दूर करता है।

फिर भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को साहूकार की बेटी की कहानी सुनाई

इस प्रकार यह कथा कहकर श्रीकृष्ण द्रौपदी से बोले- ‘यदि द्रौपदी तुम भी श्रद्धा एवं विधिपूर्वक इस व्रत को कर लो तो तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे और सुख-सौभाग्य, धन-धान्य में वृद्धि होगी।’ फिर द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के कथनानुसार करवा चौथ का व्रत रखा। उस व्रत के प्रभाव से महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार तथा पाण्डवों की जीत हुई।

करवा चौथ व्रत की कथा – तृतीया

पुराण कथा – पतिव्रता करवा धोबिन

एक करवा नाम की पतिव्रता धोबिन ,अपने बूढ़े पति के साथ तुंगभद्रा नदी के किनारे के गांव में रहती थी।एक दिन जब वह नदी के किनारे कपड़े धो रहा था, तभी अचानक एक मगरमच्छ वहां आया, और धोबी के पैर अपने दांतों में दबाकर यमलोक की ओर ले जाने लगा। वृद्ध पति यह देख घबराया और जब उससे कुछ कहते नहीं बना तो वह करवा..! करवा..! कहकर अपनी पत्नी को पुकारने लगा।

पति की पुकार सुनकर धोबिन करवा वहां पहुंची, तो मगरमच्छ उसके पति को यमलोक पहुंचाने ही वाला था, तब करवा ने मगर को कच्चे धागे से बांध दिया और मगरमच्छ को लेकर यमराज के द्वार पहुंची।

उसने यमराज से अपने पति की रक्षा करने की गुहार लगाई और बोली- हे भगवन्! मगरमच्छ ने मेरे पति के पैर पकड़ लिए है। आप मगरमच्छ को इस अपराध के दंड-स्वरूप नरक भेज दें।

करवा की पुकार सुन यमराज ने कहा- अभी मगर की आयु शेष है, मैं उसे अभी यमलोक नहीं भेज सकता। इस पर करवा ने कहा- अगर आपने मेरे पति को बचाने में मेरी सहायता नहीं कि तो मैं आपको श्राप दूंगी और नष्ट कर दूंगी।

करवा का साहस देख यमराज भी डर गए और मगर को यमपुरी भेज दिया। साथ ही करवा के पति को दीर्घायु होने का वरदान दिया।

तब से कार्तिक कृष्ण की चतुर्थी को करवा चौथ व्रत का प्रचलन में आया। जिसे इस आधुनिक युग में भी महिलाएं अपने पूरी भक्ति भाव के साथ करती है और भगवान से अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।

करवा चौथ व्रत की कथा – चौथी

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवताओं और राक्षसों के मध्‍य भयानक युद्ध हुआ , देवता हारते दिख रहे थे , तब ब्रह्मा जी ने देवताओं की पत्नियों से करवा चौथ का व्रत रखने के लिए कहा , जिसके बाद देवता विजयी हुए , और राक्षसों की हार हुई .

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

करवा चौथ में मेहँदी लगाए इन आसान डिज़ाइन से

करवा चौथ पूजन सामग्री की सूची